देश

national

प्रशासनिक उपेक्षा का दंश झेल रहा शमसा बाबा का पोखरा

الاثنين، 12 سبتمبر 2022

/ by Today Warta



राकेश केशरी 

कौशाम्बी। जल के बिना जीवन की कल्पना ही बेमानी है। इस तथ्य को भली भांति जानते हुए भी पानी की बढ़ती कमी के मद्देनजर उसके संरक्षण के प्रति बिल्कुल ही ध्यान नहीं दिया जा रहा है। यह स्थिति प्रबुद्ध वर्ग की पेशानी पर बल डाल रही है। शमसाबाद कस्बे में धर्मशाला के पास स्थित शमसा बाबा का पोखरा इस समय दयनीय स्थिति में पहुंच गया है। इस पोखरे के संरक्षण के लिए कोई प्रयास न होने से इसका अस्तित्व भी खतरे में पड़ गया है। प्रदेश में सरकार चाहे जिसकी रही हो हर बार शासन द्वारा जल संरक्षण के नाम पर अच्छी खासी धनराशि जारी की जाती रही है। इसके अलावा मनरेगा के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में हर साल तालाबों व पोखरों के संरक्षण के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं। बावजूद इसके धरातल पर इसका अपेक्षित परिणाम नजर नहीं आ रहा है। कुछ ऐसी ही स्थिति इस पोखरे को लेकर भी है। इसके संरक्षण के नाम पर अब तक लाखों रुपये खर्च हो चुके हैं,धरातल से ज्यादा काम कागजों में होने के कारण पोखरे की स्थित आज भी जर्जर है। पोखरे के चारों तरफ की मिट्टी भी बह गई है। स्नान के लिए बने घाट तक टूटे पड़े हैं। जिम्मेदारो की उदासीनता से तालाब सीवर कुंड बन गया है,ग्रामीणों का कहना है कि जल संरक्षण को देखते हुए इस पोखरे का जीर्णोद्धार कराना आवश्यक है। अन्यथा आने वाले दिनों में यह इतिहास बन कर रह जाएगा।  गांव के समाजसेवी विनोद कसेरा का कहना है कि कभी पानी का मुख्य साधन रहे तालाब,कुएं पोखरे व ताल तलैया अब रख रखाव के अभव में अपने अस्तित्व से जूझते नजर आ रहे हैं। सिराथू क्षेत्र में दर्जनों ऐसे तालाब हैं जो जर्जर अवस्था में पहुंच गए हैं। बावजूद इस ओर किसी का ध्यान नहीं है। रामशंकर कसेरा का कहना है कि धर्मशाला के निर्माण के समय यह पोखरा बहुत ही सुंदर व स्वच्छ जलयुक्त था। शमसा बाबा के इस पोखरे में गांव के लोग स्नान करते थे तथा पास स्थित मंदिर में पूजा करते थे। समय के साथ सबकुछ बदल गया। आज यह पोखरा भी अब अपने अस्तित्व रक्षा की लड़ाई लड़ रहा है। मनोज कुमार यादव ने बताया कि तालाब और कुआं खोदवाने की गांवों में वर्षों पूर्व एक परंपरा हुआ करती थी। तब इसे पुण्य का काम समझा जाता था। इस समय ऐसा करने वाले काफी कम रह गए हैं। पहले से बनाए गए कुएं तालाब व पोखरे भी अब धीरे.धीरे अतिक्रमण व कब्जा के कारण अस्तित्व खो रहे हैं। हरिहर शरण ओझा का कहना है कि जल संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए मात्र सरकारी प्रयास ही काफी नहीं है। इसके लिए हर स्तर से पुरजोर कोशिश होनी चाहिए। उन्होंने जल संरक्षण के नए संसाधनों पर जोर देते हुए कहा कि जल को राष्ट्रीय सम्पदा समझ कर उसकी एक.एक बूंद की रक्षा के लिए हमें संकल्प लेना होगा।

Don't Miss
© all rights reserved
Managed by 'Todat Warta'