तीन कर्मचारी निलंबित, जांच अधिकारी ने ही खड़े किए हाथ; अब बड़े अफसरों की भूमिका पर सवाल
आत्माराम त्रिपाठी
बांदा: चित्रकूटधाम परिक्षेत्र के बांदा रोडवेज डिपो में करीब 20 हजार लीटर डीजल से जुड़े कथित खेल ने परिवहन निगम की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 8 जुलाई को डीजल से भरे टैंकर के पहुंचने और फिर उसे वापस किए जाने की घटना के बाद शुरू हुई जांच अब खुद सवालों के घेरे में आ गई है। डीजल सेक्शन के तीन कर्मचारियों को निलंबित किया जा चुका है, लेकिन जिस व्यवस्था की निगरानी वरिष्ठ अधिकारियों के जिम्मे थी, वहां अब तक कार्रवाई न होने से सवाल उठ रहे हैं कि क्या पूरी जिम्मेदारी सिर्फ कर्मचारियों के सिर डालकर मामला खत्म करने की कोशिश हो रही है? मामले की जांच कर रहे सहायक अभियंता वित्त ने उच्च अधिकारियों को पत्र लिखकर जांच से अलग होने की इच्छा जताई है। प्रारंभिक जांच में दस्तावेजों में कथित छेड़छाड़ और रिकॉर्ड में लंबे समय से अनियमितता की आशंका जताए जाने के बाद प्रकरण और गंभीर हो गया है। यदि इन दावों की पुष्टि होती है तो मामला एक टैंकर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कई वर्षों से चली आ रही डीजल खरीद, स्टॉक और खपत की पूरी व्यवस्था जांच के घेरे में आ सकती है।
20 हजार लीटर डीजल का टैंकर पहुंचा, फिर वापस क्यों गया?: 8 जुलाई 2026 को करीब 20 हजार लीटर डीजल से भरा टैंकर बांदा डिपो पहुंचा था। बताया गया कि डिपो के टैंक में पहले से पर्याप्त डीजल मौजूद था। इसके बाद टैंकर को वापस भेजे जाने की बात सामने आई। यहीं से कई सवाल खड़े हुए। जब डिपो में पर्याप्त स्टॉक था तो इतनी बड़ी मात्रा में डीजल मंगाने की जरूरत क्यों पड़ी? आपूर्ति का आदेश किस स्तर पर जारी हुआ? टैंकर वापस करने का निर्णय किसने लिया? और यदि पूरी प्रक्रिया नियमों के तहत हुई तो जांच की नौबत क्यों आई? इन सवालों का जवाब अब तक स्पष्ट नहीं है। यही वजह है कि मामला महज डीजल की आवक-जावक से आगे बढ़कर पूरी खरीद और स्टॉक व्यवस्था की जांच की मांग तक पहुंच गया है।
तीन कर्मचारी निलंबित, निगरानी करने वाले अधिकारी कार्रवाई से बाहर?: जांच के बाद डीजल सेक्शन से जुड़े तीन कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया। लेकिन सवाल यह है कि यदि डीजल के रिकॉर्ड और स्टॉक व्यवस्था में गड़बड़ी हुई है तो क्या इसकी जिम्मेदारी केवल कर्मचारियों की है? डीजल सेक्शन की निगरानी करने वाले वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में क्यों नहीं है? खरीद से लेकर स्टॉक, वितरण और खपत तक की प्रक्रिया पर निगरानी रखने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी आखिर कौन तय करेगा? अगर नीचे के स्तर पर गड़बड़ी हुई, तो ऊपर बैठे जिम्मेदारों की जवाबदेही क्यों नहीं? यही सवाल अब पूरे मामले की निष्पक्षता पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न बनकर खड़ा है।
जांच अधिकारी ने भी लिखा—रिकॉर्ड में छेड़छाड़ की आशंका: मामले की जांच कर रहे सहायक अभियंता वित्त ने उच्च अधिकारियों को पत्र लिखकर जांच से खुद को अलग करने की इच्छा जताई है। बताया जा रहा है कि प्रारंभिक जांच में उन्हें डीजल से जुड़े दस्तावेजों में कथित छेड़छाड़ के संकेत मिले हैं। जांच अधिकारी के मुताबिक, मामला सिर्फ हालिया घटना तक सीमित नहीं हो सकता। रिकॉर्ड में यदि कई वर्षों से अनियमितता की आशंका है तो पुराने दस्तावेजों की पड़ताल करनी होगी। ऐसे में जांच का दायरा और समय दोनों बढ़ेंगे। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यदि दस्तावेजों में छेड़छाड़ की आशंका सामने आ चुकी है तो जांच को और मजबूत करने के बजाय जांच अधिकारी ही पीछे हटने की स्थिति में क्यों पहुंच गए? अब यह जिम्मेदारी उच्च अधिकारियों पर है कि वे जांच को किसी सक्षम और स्वतंत्र अधिकारी या टीम को सौंपते हैं या नहीं।
स्टेशन मास्टरों की भूमिका पर भी सवाल: प्रारंभिक जांच से जुड़े दावों में स्टेशन मास्टरों द्वारा समय-समय पर डीजल संबंधी रिकॉर्ड की पर्याप्त जांच नहीं किए जाने की बात भी सामने आई है। यदि यह सही है तो सवाल उठता है कि वर्षों तक डीजल के रिकॉर्ड की निगरानी किस तरह होती रही? स्टॉक रजिस्टर, टैंकर की आपूर्ति, डीजल वितरण और बसों की खपत का मिलान नियमित रूप से क्यों नहीं किया गया? किसी भी सरकारी व्यवस्था में रिकॉर्ड की जांच केवल कागजी खानापूर्ति नहीं हो सकती। यदि रिकॉर्ड में गड़बड़ी लंबे समय तक पकड़ में नहीं आई तो यह निगरानी तंत्र की गंभीर विफलता भी हो सकती है।
सिर्फ एक टैंकर की जांच से नहीं खुलेगा पूरा मामला: 20 हजार लीटर डीजल से जुड़े इस प्रकरण में यदि वास्तव में रिकॉर्ड में पुरानी अनियमितता की आशंका है तो जांच का दायरा केवल 8 जुलाई की घटना तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि रिकॉर्ड में दर्ज डीजल की खपत और बसों की वास्तविक खपत में कितना अंतर है। यही मिलान किसी संभावित वित्तीय अनियमितता की असली तस्वीर सामने ला सकता है।
रिकॉर्ड में गड़बड़ी हुई तो जिम्मेदार कौन?: यदि दस्तावेजों में छेड़छाड़ की पुष्टि होती है तो जांच सिर्फ यह पता लगाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए कि कागज किसने बदले। यह भी तय होना चाहिए कि रिकॉर्ड तैयार करने, सत्यापित करने, मंजूर करने और सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी किसकी थी।
किस अधिकारी ने कितने वर्षों तक रिकॉर्ड का सत्यापन किया? किसने स्टॉक की जांच की? किसने डीजल की खरीद और खपत के आंकड़ों को प्रमाणित किया? और यदि गड़बड़ी थी तो वह समय रहते पकड़ में क्यों नहीं आई? इन सवालों के जवाब के बिना तीन कर्मचारियों का निलंबन कार्रवाई से ज्यादा एकतरफा जिम्मेदारी तय करने जैसा दिखाई दे सकता है।
जांच लंबी खिंची तो उठेंगे और सवाल: मामले को लेकर यह आरोप भी सामने आ रहे हैं कि जांच को लंबा खींचे जाने से प्रकरण की गंभीरता कम करने की कोशिश हो सकती है। हालांकि, इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित अधिकारियों का आधिकारिक पक्ष सामने आना अभी बाकी है। ऐसे में जरूरी है कि जांच समयबद्ध हो, सभी दस्तावेज सुरक्षित किए जाएं और किसी भी संभावित रिकॉर्ड से छेड़छाड़ की गुंजाइश न छोड़ी जाए।
जांच में पिछले कई
वर्षों के
< डीजल खरीद रिकॉर्ड
< टैंकरों की आपूर्ति और आवक रजिस्टर
< स्टॉक रजिस्टर
< डीजल वितरण का हिसाब
< बसों की वास्तविक खपत
< भुगतान और बिल संबंधी दस्तावेज का मिलान किया जाना जरूरी होगा।
अब असली परीक्षा बड़े अधिकारियों की: बांदा रोडवेज का यह मामला अब केवल 20 हजार लीटर डीजल के एक टैंकर का नहीं रह गया है। तीन कर्मचारियों के निलंबन और जांच अधिकारी के जांच से हटने की इच्छा जताने के बाद मामला निगरानी तंत्र और अधिकारियों की जवाबदेही तक पहुंच गया है। अब देखना होगा कि उच्च अधिकारी इस मामले की स्वतंत्र जांच कराते हैं या नहीं। क्या पुराने रिकॉर्ड खंगाले जाएंगे? क्या डीजल सेक्शन की निगरानी करने वाले वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होगी? क्या दस्तावेजों में कथित छेड़छाड़ की वास्तविकता सामने लाई जाएगी? और सबसे बड़ा सवाल—अगर गड़बड़ी हुई है तो कार्रवाई सिर्फ कर्मचारियों तक सीमित रहेगी या जिम्मेदारी तय करते हुए अफसरों तक भी पहुंचेगी? फिलहाल, इन सवालों के जवाब जांच के नतीजे पर टिके हैं। लेकिन इतना तय है कि 20 हजार लीटर डीजल का यह मामला अब बांदा रोडवेज की पूरी वित्तीय और रिकॉर्ड व्यवस्था की विश्वसनीयता की परीक्षा बन चुका है। आरोपों की पुष्टि विस्तृत जांच के बाद ही होगी, मगर जांच अधिकारी द्वारा खुद जांच से अलग होने की इच्छा जताए जाने ने पूरे प्रकरण की गंभीरता और पारदर्शिता पर नए सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।










.png)
























Today Warta