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वीर विजय बजरंग बली मन्दिर डोंडाघाट पर चल रही श्रीमद भागवत कथा के छठवे दिन

الأربعاء، 16 نوفمبر 2022

/ by Today Warta



इन्द्रपाल सिंह प्रिइन्द्र

श्रीकृष्ण और रुक्मणी विवाह में झूमे लोग

छठवें दिवस की कथा में सुश्री दीप्ति श्रीजी ने श्रीकृष्ण व रुक्मणी विवाह की कथा सुनाई कथा में

ललितपुर। महाराज भीष्म अपनी पुत्री रुक्मिणी का विवाह श्रीकृष्ण से करना चाहते थे, परन्तु उनका पुत्र रुक्मणी राजी नहीं था। वह रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल से करना चाहता था। रुक्मिणी इसके लिए राजी नहीं थीं। विवाह की रस्म के अनुसार जब रुक्मिणी माता पूजन के लिए आईं तब श्रीकृष्णजी उन्हें अपने रथ में बिठा कर ले गए। तत्पश्चात रुक्मिणी का विवाह श्रीकृष्ण के साथ हुआ। ऐसी लीला भगवान के सिवाय दुनिया में कोई नहीं कर सकता। इस शास्त्र को शुकदेव मुनि राजा परीक्षित को सुनाते हैं। राजा परीक्षित इसे सुनकर मरते नहीं बल्कि अमर हो जाते हैं। प्रभु की प्रत्येक लीला रास है। हमारे अंदर प्रति क्षण रास हो रहा है, सांस चल रही है तो रास भी चल रहा है, यही रास महारास है इसके द्वारा रस स्वरूप परमात्मा को नचाने के लिए एवं स्वयं नाचने के लिए प्रस्तुत करना पड़ेगा, उसके लिए परीक्षित होना पड़ेगा। जैसे गोपियां परीक्षित हो गईं। इस दौरान कृष्ण-रुक्मिणी की आकर्षक झांकी बनाई गई। जिनके दर्शन करने भक्तजन भाव विभोर हो गए। कथा व्यास ने आगे की कथा में बताया कि शुकदेव जी बोले राजन एक दिन इंद्र ने द्वारका में आकर भगवान से कहा प्रभु भूमि का पुत्र नरकासुर प्रजा को बड़ा कष्ट दे रहा है। उसने सुर असुर, गंधर्व और राजाओं की कन्याएं अपहरण कर अपने घर में बंद कर रखी है। वरुण का छत्र अदिति के कुंडल एवं देवताओ का क्रीडास्थल मणिपर्वत भी उसने बल पूर्वक छीन लिया है। अब वह मेरे ऐरावत को भी छीनना चाहता है। आप इसका समुचित प्रतीकार करें। इंद्र के द्वारा भौमासुर का ऐसा अत्याचार सुनते ही भगवान सत्यभामा के साथ गरुड़ पर आरुढ हो तुंरत भौमासुर की राजधानी प्राग्ज्योतषपुर में पहुंचे। जो चारों ओर पर्वत, शस्त्र, जल, अग्नि और वायु से दुर्गो से घिरा था। भगवान श्री कृष्ण ने वहां पहुंचकर गदा से पर्वत, बाणो से शस्त्र और चक्र से अग्नि जल और वायु के आवरण तोड़ डाले। दोनों में युद्ध हुआ अंत में हाथी पर चढ़कर भौमासुर विशाल सेना साथ ले युद्ध भूमि में आ गया उसने आते ही भगवान पर तोप से बार किया और साथ ही साथ उसकी सेना भी भयंकर अस्त्र शस्त्र की वर्षा करने लगी। भगवान ने तीक्ष्ण वाणो से हाथी, घोड़े रथ और पैदल सहित उसकी संपर्ण सेना क्षणमात्र में काट डाली। केवल भौमासुर युद्ध में डटा रहा उसने श्री कृष्ण को मारने के लिए त्रिशूल उठाया लेकिन भगवान ने त्रिशूल के बार के पूर्व ही उसका मुकुट कुंडल सहित सिर काटकर पृथ्वी पर गिरा गया।कथा सुनकर सभी श्रद्धालुओं ने भगवान की जय जय कार करके भजनों पर झूमे। अतिथि के रूप में मनमोहन जडिय़ा, डा.दीपक चौबे सपरिवार, हरिशंकर, राकेश तामिया, राजीव शुक्ला पत्रकार, पत्रकार अमित लखेरा, राममूर्ति तिवारी, राहुल खिरिया मौजूद रहे। व्यासपीठ का पूजन किया मुख्य यजमान सीताराम विश्वकर्मा सह परिवार व सह यजमान प्रसाद नीरज तिवारी, आशीष तिवारी, आलोक खरे, राजेन्द्र सिरोठिया, ऋषि सोनी, नरसिंह पटेल, सतीश परिहार, प्रेमनारायण कुशवाहा, दीपक, राजेन्द्र दीक्षित, आकाश कुशवाहा, सोनू हलवाई, विनोद चौरसिया मौजूद रहे। इस मौके पर मंदिर के पुजारी ठाकुरदासजी, यज्ञाचार्य प्रमोद लिटौरिया, समिति के अध्यक्ष राजबहादुर श्रीवास्तव, डीके तिवारी, हरनाम सिंह तोमर, रमेश सिंह, भरत पुरोहित, जगदीश प्रसाद तिवारी, रामचरण तिवारी, प्रताप नारायण गुप्ता, रमेश नगाइच, भगवत कुशवाहा, रघुवीर शरण, सत्यनारायण विश्वकर्मा, चुन्नीलाल साहू, सतीश परिहार, नीरज तिवारी, देवेंद्र निरंजन, कृष्णकांत साहू, आशीष तिवारी, आकाश सेन, आलोक खरे मनोज साहू, राजकुमार साहू ,पंकज तिवारी, कुंजबिहारी, महेश सेन, रमेश सोनी, महेंद्र सिंदवाहा, छक्कीलाल साहू, रामकुमार नामदेव, हर्ष नामदेव, अभिषेक यादव, अजय राजपूत, राजेश यादव, कमलू यादव, विजय झा, कमल यादव, राहुल साहू, राजेंद्र यादव, दीपक यादव, गोविन्द नारायन कुशवाहा, प्रेमनारायण कुशवाहा, ब्रजनारायन कुशवाहा, मुनिराज कुशवाहा, राहुल कुशवाहा, शिवा कुशवाहा, चक्रेश कुशवाहा, रोहित कुशवाहा, पेरिस कुशवाहा, डालचंद कुशवाहा, आकाश कुशवाहा, विशाल कुशवाहा, लक्ष्मी सतभैया, पंकज सतभैया, कृष्णा सतभैया, उर्मी सतभैया के अलावा समस्त मोहल्लावासी ने कथा का श्रवण किया।

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