इन्द्रपाल सिंह प्रिइन्द्र
बनें दूल्हा छवि देखो भगवान की, दुल्हन बनीं सिया जानकी
ललितपुर। विवाह पंचमी के पावन अवसर पर आयोजित एक परिचर्चा को संबोधित करते हुए नेहरू महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य प्रो. भगवत नारायण शर्मा ने कहा कि यह विवाह तात्विक दृष्टि से तो चिरंतन है ही, पर इतिहास की दृष्टि से त्रेता युग में संपन्न होता है, किंतु समसामयिक युग में ऐसा एक भी घर नहीं है जिसके प्रत्येक आंगन में राजा जनक का मंडप ना बना हो तथा प्रत्येक कन्या व वर- सीता व राम के रूप में सदा के लिए बंधन में न बँधे हों। उक्त प्रसंग में, लोकगीत चाहे बुंदेली, अवधी, बृज, छत्तीसगढ़ी, भोजपुरी, राजस्थानी, असमिया, कश्मीरी या दक्षिण भारत के ही क्यों न हों, प्रत्येक नव युगल के घरों में बन्ना बन्नी बनकर, राम-सीता लौकिक रूप में पधारते हैं। इसलिए धनुष भंग के पश्चात देश भर की बालाऐं बुंदेली तर्ज पर राम से ठिठोली करते हुए, बेधड़क वरमाला के समय कह उठतीं हैं झुक जइयो तनक रघुवीर लली हमारी छोटी है। तुलसीदास जी को बड़ा आनंद आता है कि भांवरी के समय, राम को सीता जी के जब पीछे पीछे चलना पड़ता है, उन्हें क्यों ना भाव विभोर होना पड़े ? क्योंकि तुलसीदास जी का मानना है कि मोरे मन प्रभु अस विश्वासा, रामतें अधिक रामकरिदासा गठजोड़े में बँधी गाँठ की ओर आगे चलती हुई विदेहनंदिनी, पीछे पीछे चल रहे राम से कदाचित संकेत कर रही हैं कि जीव को कहीं विसार न दें, इसलिए याददाश्त की गांठ अच्छी तरह से बांधे रखें। जनक मण्डप मानो जीव का हृदय बन गया है तथा कन्यादान के समय ग्रंथिबंधन (गठबन्धन) होता है, जिसका आशय है-ईश्वर बंधा हुआ है, क्योंकि उसने भक्तों की अहंताऔर ममता को स्वीकार कर लिया है। सिंदूरदान विवाह का अति मनोरम कृत्य है। तुलसीदासजी कहते हैं राम सीय सिर सेंदुर देहीं अर्थात अखंड सौभाग्यवती भव कहकर स्वयं को चिरंजीवी रहने का वरदान, अपनी जीवन संगिनी से ले रहे हों। गोस्वामीजी ने इस प्रसंग के माध्यम से यह बताया है कि निष्काम जनकश्री सीताजी का समर्पण करके धन्य हो गए तथा सकाम दशरथजी तो भगवान श्रीराम और साक्षात भक्ति रूपा सीताजी को लेकर लौटते हैं तो जीवन में परिपूर्णता का अनुभव करते हैं। प्रत्येक गृहस्थ के घर में, ऐसे ही विलक्षण विवाह के स्वर्णिम अवसर, आनंद की वृष्टि करते रहें। इसी में इस प्रसंग की सार्थकता है।

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