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पीएम का स्वच्छता अभियान नही चढ़ा परवान,शौचालयों मे भरे जा रहे उपले

الجمعة، 9 ديسمبر 2022

/ by Today Warta



राकेश केसरी

गांव-गांव बने शौचालय कागजों तक है सीमित

कौशाम्बी। सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान के अंर्तगत जिलें की 18 लाख की आबादी मे दस हजार बने शौचालयों मे केवल कागजो पर निर्माण दिखा कर धन का बंदर बांट हुआ है। गांव-गांव बने शौंचालयों मे अधिकतर नष्ट हो गए है या फिर उनमे उपले भरे जा रहे है। जिससे प्रधान मंत्री का स्वच्छता अभियान जमीनी हकीकत से कोसों दूर है। प्रधानमंत्री का सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान घर घर शौचालय निर्माण कराकर खुले मे शौच न करने का है। लेकिन 18 लाख की आबादी मे दस हजार से अधिक शौंचालय निर्माण कराए गए है। जो केवल कागजों पर सिमट कर रह गए है। ब्लाक कर्मचारियों से लेकर प्रधानों ने लोगो को रकम देकर कागजों मे शौंचालय निर्माण दर्शाकर धन का बंदर बांट कर लिया है। गावों मे जो शौंचालय बने भी है। उनमे केवल उपले भरे जा रहे है। लोग शौंच के लिए एक भी शौंचालय का प्रयोग नही कर रहे है। इस लिए गावों मे सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान की तस्वीर परवान नही चढ़ रही है। गौरतलब हैं की गावों मे आज भी 75 फीसदी जनता खुले मे शौंच करने के लिए मजबूर है। गांव मे जो शौंचालय बनवाने का धन आवटित है। वह ऊट के मुँह मे जीरा साबित हो रहा है। क्योकि शौंचालय निर्माण के लिए आवंटित धनराशि मे चालिस फीसदी कमीशन मे शौंचालय आधे अधूरे तैयार होते है। विकास भवन के द्वारा सर्वे रिर्पोट पर गौर करें तो सभी गावों मे नब्बें फीसदी शौंचालय बन कर तैयार है। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है। गावों मे बनने वाले शौंचालय ब्लाक की जिम्मेदारी मे बनते है। जिसमे कर्मचारियों का कहना होता है। कि लाभार्थी का नाम शौंचालय मे दर्ज हो उसके बाद कौन गावों की तरफ  मुड़कर देखता है। यदि गावों की तस्वीर पर गौर करे तो गावों मे शौंचालय के केवल गड्डे ही दिखाई देंगे। इसी लिए गावों मे रहने वाले अधिकतर लोग गंभीर बीमारियों के शिकार हो रहे है। खुले मे शौंच करना पर्यावरण को दूषित करना है। वही महिला उत्पीडन की सबसे अधिक घटनाओं के पीछे खुले में शौंच करने जाने का कारण है। 


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