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बाल मन को अब नहीं भाते बाल साहित्य,मिकी माउस व मिस्टर बीन बने चहेते

الأربعاء، 9 نوفمبر 2022

/ by Today Warta



राकेश केसरी

कौशाम्बी। वक्त ने ऐसी करवट ली है कि बाल साहित्य बिसरे दिनों की बात हो गई। कॉमिक्स के साथ ज्ञानवर्धक कहानियों का खजाना कही जाने वाली चंदामामा,चंपक,नंदन जैसी किताबों की बिक्री न के बराबर है। जनपद में ऐसी किताबों से अटी रहने वाली एक दर्जन से ज्यादा शॉप बंद हो गई हैं। समाज शास्त्री बाल मन के बाल साहित्य से दूर होने को शुभ संकेत नहीं मानते। एक दशक पूर्व तक कॉमिक्स बच्चों की सबसे चहेती चीज मानी जाती थी। चाचा चैधरी व साबू बच्चों के सर्वाधिक पसंदीदा करेक्टर थे। मोटू-पतलू, घसीटाराम व नागराज की कॉमिक्स व डाइजेस्ट का बच्चे महीनों इंतजार किया करते थे। तब किराये पर भी बाल साहित्य मिलता था। नंदन, चंपक, बाल भारती, चंदामामा व पंचतंत्र की कहानियों के अंक का भी खूब इंतजार होता था। बाजार में आते ही यह किताबें हाथों-हाथ बिक जाती थीं। दस वर्ष पूर्व तक इन किताबों की शहर में हजारों की संख्या में बिक्री होती थी जो अब घटकर सैकड़ों में पहुंच गई है। वर्तमान दौर में मिकी माउस व मिस्टर बीन बच्चों के सबसे चहेते बने हैं। इसके अलावा पॉवर रेंजर जैसे कार्टून भी उन्हें खूब पसंद हैं। गणेशा, रामायण व बाल हनुमान जैसे कार्टून शो के भी बच्चे दीवाने हैं। बच्चों के ज्ञानवर्धक बाल साहित्य से किनारा करने के पीछे अभिभावक भी खासे जिम्मेदार हैं। समाजसेवी व शमसाबाद गांव के पूर्व प्रवक्ता हरिहर शरण ओझा का कहना है कि बच्चों का बाल साहित्य से किनारा खतरनाक है, किताबों से न केवल उनकी सोच विकसित होती है, बल्कि यह सामाजिक ज्ञान का भी स्त्रोत है। कार्टून व वीडियो गेम्स बीमारी के घटक हैं।

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