देश

national

कृषि वैज्ञानिको ने प्राकृतिक खेती के प्रति कृषको को किया जागरूक

الأربعاء، 21 ديسمبر 2022

/ by Today Warta



राकेश केसरी
कौशाम्बी। कृषि विज्ञान केन्द्र महगांव के मृदा वैज्ञानिक डा0 मनोज कुमार सिंह ने ग्राम बैंगवा फतेहपुर, विकास खंड बारा मे गौ आधारित प्राकृतिक खेती के प्रति    कृषको को जागरूक करते हुए कहा कि वर्षों से खेतो मे उपयोग होने वाले रसायनो एवं कीटनाशकों से खेती में काफी नुकसान दिखाई दे रहा है। इसका मुख्य कारण लगातार हानिकारक कीटनाशकों रासायनिक उर्वरक का उपयोग बढ़ता जा रहा हैं।जिससे भूमि के प्राकृतिक स्वरूप में भी बहुत बदलाव हो रहे है,जो हमारे लिए काफी नुकसानदायक हो रहे है।जिसके फलस्वरूप रासायनिक खेती से प्रकृति के साथ ही मनुष्य के स्वास्थ्य में काफी गिरावट आ रही है। किसानों की पैदावार का आधा हिस्सा उनके उर्वरक और कीटनाशको में ही चला जाता है। जिससे खेती की लागत भी दिनोंदिन बढ रही है। प्राकृतिक खेती मे सिर्फ प्रकृति के द्वारा निर्मित उर्वरक और अन्य पेड़ पौधों के पत्ते खाद,गाय का गोबर,गोमूत्र खाद के रूप मे प्रयोग मे लाया जाता है। प्राकृतिक खेती में कीटनाशकों के रूप में नीम के पत्ते गाय के गोबर की खाद,कम्पोस्ट,खाद जीवाणु खाद,फसल जानवरो के अवशेष और अन्य प्रकृति में उपलब्ध खनिज जैसे-रॉक फास्फेट, जिप्सम चुना मिट्टी आदि द्वारा पौधों को पोषक तत्व दिए जाते हैं। प्राकृतिक खेती में प्रकृति में उपलब्ध जीवाणुओं, मित्र कीट और जैविक कीटनाशक द्वारा फसल को हानिकारक जीवाणुओं से बचाया जाता हैं। कृषक अनुज कुमार के खेत मे प्राकृतिक खेती का गेहूं का प्रदर्शन लगवाया। गेंहू के बीज का बीज शोधन बीजामृत बनवाया जिसमे 100 किलो बीज के उपचार के लिए 5 किलो गोबर, 5 लीटर गोमूत्र, 50 ग्राम चुना, एक मुट्ठी पीपल के पेड़ के नीचे की उपजाऊ मिट्टी, 20 लीटर पानी में मिलाकर दिन में दो बार लकड़ी से घड़ी की सुई की दिशा में चलाकर घोल बनाकर इसे छांव में सुखाकर बुआई सीड ड्रिल से करवाई।अब इसमे रासायनिक उर्वरक की जगह जीवामृत, घनजीवामृत का प्रयोग कराया जायेगा।और किसान के परम्परागत विधि से की गई बुआई विधि से तुलनात्मक अध्ययन कर रिपोर्ट तैयार की जाएगी।


Don't Miss
© all rights reserved
Managed by 'Todat Warta'