पांच लाख तक के जुमार्ने वाले मामलों में 5 से 10 हजार की कार्रवाई!
ब्रांडेड तेल, बेसन और मैदा के नमूने फेल, फिर भी असुरक्षित खाद्य पदार्थों की बिक्री पर रोक नहीं
इन्द्रपाल सिंह’प्रिइन्द्र’
हिन्द टुडे वार्ता/ललितपुर। जनता की थाली में क्या परोसा जा रहा है, इसकी जिम्मेदारी संभालने वाला खाद्य सुरक्षा विभाग और उसके उच्च अधिकारियों की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस तरह के मामलों में कानून के तहत भारी जुमार्ने का प्रावधान है, उनमें कथित तौर पर महज 5 हजार से 10 हजार रुपये का जुमार्ना लगाकर कार्रवाई क्यों निपटा दी जाती है। अगर यही कार्रवाई का पैमाना है तो मिलावटखोरों में कानून का डर कैसे पैदा होगा?
बाजार में खुला व पैकिंग में मिलने वाला खाने-पीने की सामग्री लोगों की सेहत के लिए सुरक्षित है कि नहीं इसको जांचने की जिम्मेदारी शासन ने खाद्य सुरक्षा विभाग को सौंप रखी है। समय-समय पर विभाग दुकानों से नमूना लेता है और उसकी जांच प्रयोगशाला में भेजी जाती है। इनमें लगभग सभी नमूने फेल ही होते हैं। अब ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मिलावटखोरों पर वास्तव में कानून का शिकंजा कसा जा रहा है या फिर कार्रवाई केवल कागजी खानापूर्ति तक सीमित है। गौरतलब है कि जिन मामलों में खाद्य सुरक्षा कानून के तहत पांच से दस लाख रूपए तक कठोर आर्थिक दंड का प्रावधान है, उनमें कथित तौर पर महज 5 हजार से 10 हजार रुपये तक का जुमार्ना लगाकर कार्रवाई पूरी कर दी जाती है। मामला सीधे जनता के स्वास्थ्य और जीवन से जुड़ा है। यदि मिलावटखोरों पर मामूली जुमार्ना लगाकर मामला निपटा दिया जाता है और असुरक्षित खाद्य पदार्थों की बिक्री जारी रहती है, तो इससे मिलावटखोरों के हौसले बढऩे की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
नमूने फेल, फिर भी बिक्री पर रोक क्यों नहीं?
खाद्य पदार्थ का नमूना जांच में असुरक्षित या मानकों के विपरीत पाए जाने पर उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर सवाल पैदा होता है। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि किसी खाद्य पदार्थ को मानव उपभोग के लिए असुरक्षित पाया गया, तो उसकी बिक्री तत्काल प्रभाव से रुकवाने और बाजार से स्टॉक हटवाने की कार्रवाई क्यों नहीं की गई। यदि असुरक्षित खाद्य सामग्री बाजार में उपलब्ध रहती है तो इसका सीधा असर आम उपभोक्ता की सेहत पर पड़ सकता है। विभागीय कार्रवाई का उद्देश्य केवल नमूना लेना और जुमार्ना लगाना नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं को असुरक्षित खाद्य पदार्थों से बचाना भी होना चाहिए।
बड़े ब्रांडों के नमूने फेल होने पर जिम्मेदारी किसकी?
सबसे गंभीर स्थिति ब्रांडेड पैकिंग वाले खाद्य पदार्थों को लेकर सामने आ रही है। मिलावटखोरी का सबसे बड़ा नुकसान उस आम आदमी को उठाना पड़ता है जो बाजार से पैकिंग देखकर भरोसे के साथ सामान खरीदता है। तेल, बेसन, मैदा समेत अन्य खाद्य वस्तुओं के नमूने जांच में फेल होने की बात सामने आने के बावजूद संबंधित प्रतिष्ठानों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई और बाजार से असुरक्षित खाद्य सामग्री हटाने को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। यदि किसी प्रतिष्ठित ब्रांड के उत्पाद का नमूना मानकों पर खरा नहीं उतरता है तो केवल छोटे विक्रेता पर कार्रवाई पर्याप्त है या निमार्ता, सप्लायर, वितरक और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
इनका कहना
समाचार के संदर्भ में अपर जिलाधिकारी से फोन पर बार्ता करने के लिये कई बार सम्पर्क किया गया, लेकिन उनसे बात नही हो सकी।
दिनेश कुमार
अपर जिलाधिकारी (वि./रा.)








