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परिवार : भारत की पहली पाठशाला या टूटती हुई संस्था?

On: August 2, 2026 7:46 AM
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श्रृंखला : भारतीय संस्कृति का आत्ममंथन (तृतीय कड़ी)

आत्माराम त्रिपाठी
भारत ने कभी केवल विद्यालयों से राष्ट्र निर्माण का स्वप्न नहीं देखा। हमारी संस्कृति ने सदैव माना कि विद्यालय शिक्षा देता है, किंतु परिवार संस्कार देता है। शिक्षा मनुष्य को कुशल बना सकती है, पर संस्कार ही उसे श्रेष्ठ बनाते हैं। यही कारण है कि भारतीय चिंतन में परिवार को समाज की सबसे छोटी इकाई नहीं, बल्कि राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति माना गया है। आज प्रश्न यह नहीं कि परिवार बदल रहे हैं। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। प्रश्न यह है कि क्या परिवर्तन के नाम पर परिवार अपनी आत्मा खोता जा रहा है?
भारतीय परंपरा में शिशु का पहला विद्यालय माँ की गोद, पहला अनुशासन पिता का स्नेह और पहला सामाजिक विश्वविद्यालय परिवार माना गया है। हमारे ऋषियों ने गुरुकुल भेजने से पहले बालक को परिवार में संस्कारित किया, क्योंकि वे जानते थे कि जिसने घर में बड़ों का सम्मान नहीं सीखा, वह ज्ञान का वास्तविक अधिकारी भी नहीं बन सकता।
तैत्तिरीय उपनिषद का उपदेश— “मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव” — केवल आध्यात्मिक संदेश नहीं, बल्कि भारतीय परिवार व्यवस्था का मूल सिद्धांत है। इसमें भी क्रम महत्वपूर्ण है—पहले माता, फिर पिता और उसके बाद आचार्य। अर्थात शिक्षा की प्रथम पाठशाला परिवार ही है।
रामायण इसका सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्तुत करती है। श्रीराम का व्यक्तित्व केवल महर्षि वशिष्ठ की शिक्षा से नहीं बना; उसकी नींव माता कौशल्या, पिता दशरथ, भ्रातृप्रेम और रघुकुल की मयार्दाओं ने रखी। भरत ने राजसिंहासन इसलिए अस्वीकार किया क्योंकि परिवार ने उन्हें अधिकार से पहले धर्म का संस्कार दिया था।
महाभारत इसका दूसरा पक्ष दिखाती है। जहाँ परिवार में अहंकार, पक्षपात और संवादहीनता बढ़ी, वहाँ हस्तिनापुर जैसा समृद्ध साम्राज्य भी विनाश से नहीं बच सका। धृतराष्ट्र का पुत्रमोह, शकुनि की कुटिलता और दुर्योधन का अहंकार केवल एक परिवार का नहीं, पूरे आर्यावर्त का संकट बन गया। यह प्रसंग आज भी चेतावनी देता है कि जब परिवार अपने मूल्य खो देता है, तब समाज की स्थिरता भी खतरे में पड़ जाती है।
इतिहास भी यही सत्य दोहराता है। छत्रपति शिवाजी महाराज के भीतर स्वराज्य का बीज माता जीजाबाई ने रोपा। गुरु गोविंद सिंह के अदम्य साहस के पीछे गुरु तेग बहादुर के बलिदान और माता गुजरी के संस्कार थे। स्वामी विवेकानंद स्वयं अपनी माता को अपने व्यक्तित्व की आधारशिला मानते थे। स्पष्ट है कि महान व्यक्तित्व केवल प्रतिभा से नहीं, संस्कारों से निर्मित होते हैं।
फिर प्रश्न उठता है कि आज ऐसा क्या बदल गया है?
आज घर बड़े हो गए हैं, पर परिवार छोटे हो गए हैं। सुविधाएँ बढ़ी हैं, पर साथ बैठकर भोजन करने का समय घट गया है। बच्चों के हाथों में आधुनिक उपकरण हैं, लेकिन दादा-दादी की कहानियाँ उनसे दूर होती जा रही हैं। माता-पिता बच्चों के भविष्य पर धन खर्च करने को तैयार हैं, किंतु प्रतिदिन कुछ समय उनके साथ बिताना कठिन होता जा रहा है।
यह केवल जीवनशैली का परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना में गहरा बदलाव है।
संयुक्त परिवारों का विघटन, अत्यधिक व्यस्त जीवन, डिजिटल संसार पर बढ़ती निर्भरता और उपभोक्तावादी सोच ने पारिवारिक संवाद को प्रभावित किया है। आधुनिकता का विरोध नहीं किया जा सकता और न ही किया जाना चाहिए, लेकिन यदि आधुनिकता की कीमत रिश्तों का क्षरण हो, तो यह प्रगति नहीं, चेतावनी है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी प्रारंभिक बाल्यावस्था में परिवार की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण मानती है। वैज्ञानिक शोध भी बताते हैं कि व्यक्तित्व की सबसे मजबूत नींव जीवन के प्रारंभिक वर्षों में घर में ही रखी जाती है। विद्यालय उस नींव पर भवन का निर्माण करता है; नींव परिवार ही तैयार करता है।
आज समाज में बढ़ती हिंसा, नशे की प्रवृत्ति, मानसिक तनाव, अकेलापन और सामाजिक असंवेदनशीलता पर निरंतर चर्चा होती है। अनेक योजनाएँ बनती हैं, किंतु क्या हमने कभी गंभीरता से यह विचार किया कि इन समस्याओं की जड़ कहीं परिवारों में कमजोर होते संवाद और संस्कार तो नहीं हैं?
बच्चे सुनते कम हैं, देखते अधिक हैं। यदि घर में सम्मान होगा, तो वे सम्मान सीखेंगे; यदि कटुता होगी, तो वही उनके स्वभाव का हिस्सा बनेगी। यदि परिवार में राष्ट्र, समाज और संस्कृति पर सकारात्मक चर्चा होगी, तो वही उनके व्यक्तित्व में भी प्रतिबिंबित होगी। परिवार वास्तव में वह प्रयोगशाला है जहाँ अगली पीढ़ी का चरित्र गढ़ा जाता है।
भारत ने संसार को केवल योग, वेद और दर्शन ही नहीं दिए, बल्कि सुदृढ़ पारिवारिक व्यवस्था का आदर्श भी दिया। यही कारण था कि अनेक विदेशी यात्रियों ने भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसके परिवारों और सामाजिक जीवन को माना।
आज आवश्यकता संयुक्त और एकल परिवार की बहस से आगे बढ़ने की है। प्रश्न परिवार के आकार का नहीं, उसकी आत्मीयता का है। यदि तीन सदस्य भी साथ बैठकर संवाद करें, एक-दूसरे का सम्मान करें और बच्चों को संस्कार दें, तो वही परिवार राष्ट्र निर्माण की सशक्त इकाई बन सकता है।
भारत का भविष्य केवल संसद में नहीं, घरों में भी तय होगा। संसद कानून बना सकती है, न्यायालय न्याय दे सकता है और विद्यालय शिक्षा दे सकता है, किंतु चरित्र का निर्माण केवल परिवार कर सकता है।
अंत में समाज से केवल एक प्रश्न—
यदि आने वाली पीढ़ी को संस्कार देने की जिम्मेदारी परिवार छोड़ देगा, तो क्या कोई विद्यालय, कोई कानून, कोई तकनीक अथवा कोई शासन उस रिक्त स्थान की भरपाई कर सकेगा?
यदि उत्तर ‘नहीं’ है, तो अभी भी समय है कि हम परिवार को केवल साथ रहने की व्यवस्था नहीं, बल्कि साथ जीने की संस्कृति बनाएँ।
क्योंकि जिस दिन भारत का परिवार सुदृढ़ होगा, उसी दिन समाज भी सुदृढ़ होगा; और जब समाज सुदृढ़ होगा, तब राष्ट्र को शक्तिशाली बनने से कोई शक्ति नहीं रोक सकेगी।

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