आत्माराम त्रिपाठी
“गुरु पूर्णिमा का सच्चा संदेश यही है—गुरु का सम्मान केवल वंदना में नहीं, बल्कि उनके आदर्शों पर चलने में है।”
पिछले लेख का समापन इसी विचार के साथ हुआ था। किंतु इस निष्कर्ष के बाद एक और प्रश्न सहज ही मन में उठता है—यदि गुरु के आदर्शों पर चलना ही वास्तविक श्रद्धा है, तो भारतीय संस्कृति द्वारा हजारों वर्षों से दिया गया यह महान उपदेश—”मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव”—क्या आज केवल एक श्लोक बनकर रह गया है?
यह कोई साधारण वाक्य नहीं है। तैत्तिरीय उपनिषद में गुरु अपने शिष्य को गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने से पहले अंतिम उपदेश देते हुए कहते हैं—”मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव, अतिथिदेवो भव।” अर्थात् माता को देवतुल्य मानो, पिता को देवतुल्य मानो, आचार्य को देवतुल्य मानो और अतिथि का भी देवतुल्य सम्मान करो। यह केवल धार्मिक शिक्षा नहीं थी; यह भारतीय समाज की नैतिक संरचना का आधार था।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस क्रम में सबसे पहले माता, फिर पिता, उसके बाद आचार्य का उल्लेख है। यह क्रम संयोग नहीं, बल्कि जीवन की वास्तविक यात्रा का दर्शन है। माँ जीवन देती है, पिता जीवन को आधार देता है और आचार्य जीवन को दिशा देता है। इन तीनों के बिना मनुष्य का व्यक्तित्व अधूरा है।
भारतीय परंपरा में माता को प्रथम गुरु इसलिए कहा गया क्योंकि शिशु का पहला विद्यालय उसकी गोद होती है। बोलना, चलना, प्रेम करना, करुणा सीखना, सत्य बोलना, अनुशासन, संयम, संस्कार—इन सबका पहला पाठ किसी विद्यालय में नहीं, माँ की ममता में मिलता है। इसलिए हमारे यहाँ कहा गया—”जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।” माता और मातृभूमि दोनों ही जीवन के प्रथम आदर्श हैं।
रामायण इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। श्रीराम का चरित्र केवल महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र की शिक्षा से नहीं बना; उसकी नींव माता कौशल्या, पिता दशरथ और रघुकुल की परंपरा ने रखी। भगवान राम ने वनवास को राज्य से बड़ा इसलिए नहीं माना कि उन्हें राज्य से मोह नहीं था, बल्कि इसलिए कि उनके लिए पिता का वचन धर्म था।
महाभारत में भीष्म पितामह, विदुर, द्रोणाचार्य और कृपाचार्य जैसे अनेक गुरु हैं, लेकिन श्रीकृष्ण ने स्वयं अर्जुन को यही सिखाया कि धर्म का आधार केवल ज्ञान नहीं, बल्कि कर्तव्य है। ज्ञान यदि आचरण में न उतरे तो वह केवल सूचना रह जाता है।
इतिहास भी यही कहता है। छत्रपति शिवाजी महाराज के निर्माण में यदि समर्थ गुरु रामदास का योगदान था तो उससे पहले माता जीजाबाई के संस्कारों की अमिट छाप थी। गुरु गोविंद सिंह के भीतर जो अदम्य साहस दिखाई देता है, उसकी जड़ें उनके पिता गुरु तेग बहादुर के बलिदान और माता गुजरी जी के संस्कारों में थीं। स्वामी विवेकानंद यदि विश्वविख्यात बने तो स्वयं उन्होंने अनेक अवसरों पर स्वीकार किया कि उनकी माता भुवनेश्वरी देवी ने उनके व्यक्तित्व की नींव रखी।
स्पष्ट है कि महान व्यक्तित्व पहले महान परिवारों में जन्म नहीं लेते, बल्कि महान संस्कारों में निर्मित होते हैं।
किन्तु आज का समाज एक विचित्र विरोधाभास के दौर से गुजर रहा है। तकनीकी प्रगति अभूतपूर्व है, शिक्षा के साधन पहले से अधिक हैं, आर्थिक अवसर भी बढ़े हैं, लेकिन क्या संस्कार भी उसी गति से आगे बढ़े हैं?
आज बच्चे महँगे विद्यालयों में पढ़ते हैं, किंतु माता-पिता के साथ बैठकर भोजन करने का समय नहीं है। मोबाइल पर हजारों मित्र हैं, पर घर में बैठे वृद्ध माता-पिता से बात करने का धैर्य नहीं है। इंटरनेट पर ज्ञान का असीम भंडार है, लेकिन जीवन का ज्ञान देने वाले गुरु और अभिभावक उपेक्षित होते जा रहे हैं।
समाजशास्त्री लंबे समय से इस परिवर्तन की ओर संकेत करते रहे हैं कि शहरीकरण, एकल परिवारों का विस्तार, तेज़ आर्थिक प्रतिस्पर्धा और उपभोक्तावादी जीवनशैली ने पारिवारिक संबंधों की प्रकृति बदल दी है। परिवर्तन स्वाभाविक है, लेकिन यदि उसके साथ संवेदनाएँ क्षीण होने लगें, तो यह केवल सामाजिक नहीं, सांस्कृतिक संकट भी बन जाता है।
आज माता-पिता के सम्मान पर भाषण अधिक हैं, सेवा कम। शिक्षक दिवस पर पुष्प अधिक हैं, गुरु के विचारों पर चलने वाले विद्यार्थी कम। धार्मिक आयोजनों में भीड़ अधिक है, लेकिन समाज के कमजोर और उपेक्षित वर्ग के प्रति संवेदना अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है।
भारतीय संस्कृति ने कभी पूजा को केवल अनुष्ठान नहीं माना। हमारे यहाँ सेवा ही सर्वोच्च साधना मानी गई। यदि वृद्ध माता-पिता घर में उपेक्षित हों और हम बाहर सेवा के बड़े-बड़े आयोजन करें, तो यह आत्ममंथन का विषय अवश्य है।
यह भी ध्यान रखना होगा कि हर परिवर्तन नकारात्मक नहीं होता। आज भी देश में लाखों परिवार अपने माता-पिता की सेवा को धर्म मानते हैं, असंख्य शिक्षक सीमित संसाधनों में राष्ट्र का भविष्य गढ़ रहे हैं, और अनेक युवा अपने परिवार तथा समाज के प्रति उत्तरदायित्व निभा रहे हैं। यही भारत की आशा है। किंतु आदर्शों की रक्षा केवल अच्छे उदाहरणों से नहीं, निरंतर जागरूकता से भी होती है।
भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उसने व्यक्ति-पूजा नहीं, मूल्य-पूजा सिखाई। गुरु इसलिए पूजनीय नहीं था कि उसके अनुयायी अधिक थे; वह इसलिए पूजनीय था क्योंकि उसका जीवन उसके उपदेश का प्रमाण था। गुरु गोविंद सिंह ने त्याग सिखाया क्योंकि उन्होंने स्वयं त्याग किया। महर्षि दयानंद ने सत्य का आग्रह किया क्योंकि उन्होंने स्वयं उसका मूल्य चुकाया। स्वामी विवेकानंद ने चरित्र की बात की क्योंकि उनका अपना जीवन उसी का उदाहरण था।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम गुरु के स्वरूप को पुनः समझें। गुरु वह नहीं जो केवल प्रभावित करे; गुरु वह है जो परिवर्तित करे। माता वह नहीं जो केवल जन्म दे; माता वह है जो संस्कार दे। पिता वह नहीं जो केवल पालन करे; पिता वह है जो चरित्र का आधार बने। आचार्य वह नहीं जो केवल पाठ पढ़ाए; आचार्य वह है जो अपने आचरण से शिक्षा दे।
शायद इसी कारण भारतीय मनीषियों ने ‘आचार्य’ शब्द बनाया—जो अपने आचरण से सिखाए।
अंततः प्रश्न फिर वहीं आकर खड़ा होता है—
क्या “मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव” आज भी हमारे जीवन का मार्गदर्शक है, या केवल दीक्षांत समारोहों और पुस्तकों में उद्धृत होने वाला एक सुंदर श्लोक?
यदि उत्तर दूसरा है, तो हमें श्लोक बदलने की नहीं, स्वयं बदलने की आवश्यकता है।
भारतीय संस्कृति की शक्ति उसके शास्त्रों में जितनी है, उससे कहीं अधिक उसके व्यवहार में है। जिस दिन यह उपनिषद् का वाक्य फिर से हमारे घरों में जीवित हो जाएगा, उस दिन गुरु पूर्णिमा, शिक्षक दिवस और मातृ-पितृ वंदना जैसे आयोजन केवल औपचारिक उत्सव नहीं रहेंगे, बल्कि जीवन की स्वाभाविक अभिव्यक्ति बन जाएँगे।
क्योंकि जिस समाज में माता का सम्मान, पिता का आदर और आचार्य का मार्गदर्शन जीवित रहता है, उसी समाज का भविष्य सुरक्षित रहता है। और जो समाज अपने प्रथम गुरुओं को भूल जाता है, इतिहास भी धीरे-धीरे उसे भूलने लगता है।








