राकेश केशरी
मानवाधिकार के नाम पर 1980 से आज भी कायम है,पंरम्परा
कौशाम्बी। आम आदमी हो या विशिष्ट व्यक्ति। आरोपी हो या फिर अपराधी। कानून के दायरे में आने के बाद हर किसी को थाने में हवालात की हवा खानी पड़ती है, लेकिन सिटीजन चार्टर के अनुसार सबके मानवाधिकार हैं। अपराध की सजा उन्हें भले ही मिले, पर मानवाधिकार के नाते खाकी को हवालात में भी उन्हें भोजन-पानी देना पड़ता है। ढाबे पर एक थाली के भोजन के लिए भले ही 80 से 100 रुपये देने पड़ें, लेकिन थाने की रसोई में हवालात के बंदियों के भोजन लिए सिर्फ पांच रुपये की हाड़ी चढ़ती है। हैरत की बात है कि पुलिस विभाग में यह व्यवस्था 1980 से चली आ रही है। थाने की रसोई में प्रतिदिन हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या के आधार पर भोजन पकता है। कभी-कभी यह संख्या दर्जनों हो जाती है। पांच रुपये में उनके लिए भोजन की व्यवस्था तो हो नहीं सकती, ऐसे में पुलिसकर्मी मजबूरन खुद पैसे लगाते हैं। वहीं, प्रति आरोपित,अपराधी पांच रुपये के हिसाब से सरकारी कोष से भुगतान होता है। करीब चार दशकों में महंगाई आसमान छूती गई। पुलिसकर्मियों के वेतन-भत्ते भी बढ़े पर इस व्यवस्था में परिवर्तन नहीं हुआ। अनुशासनहीनता के भय के चलते किसी थाने का मेस का प्रभारी इसके लिए आवाज भी नहीं उठाता। बतां दें कि थाने के लॉकअप में किसी वांछित के रुकने पर लंच और डिनर के समय पर उसे भोजन परोसा जाता है। इसके लिए प्रति खुराकी (पांच रुपये) कटती है। अपर पुलिस अधीक्षक समर बहादुर ने बताया कि मानवाधिकार को ध्यान में रखते हुए थाने में रखे जाने वाले बंदियों को भोजन देना अनिवार्य है। इसका बजट शासन से आवंटित होता है।

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