राकेश केसरी
कौशाम्बी। समय के साथ बदलाव की बयार कुछ इतनी तेजी के साथ बही है कि कभी-कभी मन मसोस कर रह जाता है। कहां गये वे दिन, कहां गये वे लोग और उन दिनों का खानपान यह सोचकर मन व्यग्र हो उठता है। इसी बदलाव का शिकार खाड़ (राब) गायब होकर रह गया है। गर्मी के साथ ही लू से छुटकारा के साथ सर्दियो में शरीर को फायदा दिलाने वाले खाड़ का रस अब गांवों से भी गायब हो गया है। ईख की खेती के प्रति किसानों में बढ़ रही अरुचि का असर है कि जरूरत पर इसे ढूंढते रह जायेंगे। खाड़ का प्रयोग गांवों में लोग खूब करते थे। गन्ने के रस से बनने वाले इस खाद्य पदार्थ में औषधीय गुणों की भरमार होती है। खासकर लू लगने पर तो यह रामबाण साबित होता था। वर्तमान समय में गन्ने की खेती में आ रही कमी ने हम सभी को इससे दूर कर दिया है। एक दौर था जब कहीं कोई धूप से आता था या कहीं निकलने की तैयारी करता था तो खाड़ के रस का सेवन करके निकलता था ताकि लू न लगे। उस दौर में शायद ही ऐसा कोई घर रहा हो जिसके घर में गन्ने के रस से बना खाड़ व गुड़ उपलब्ध न रहा हो। आज शायद ही कोई ऐसा घर हो जहां खाड़ उपलब्ध हो। लोगों की माने तो आबादी की बढ़त के साथ कृषि भूमि सिमटती चली जा रही है। इससे किसान गन्ने की बजाय अब गेहूं, धान, अरहर जैसे खाद्यान्नों की खेती अधिक करने लगे हैं। गांवों में गिने-चुने किसान ऐसे होंगे जो थोड़ा बहुत गन्ने की खेती करते होंगे। आयुर्वेद में भी औषधियों के बनाने में इसकी उपयोगिता काबिले तारीफ है। आयुर्वेदिक ड़ा0 अमर सिंह बताते है कि आयुर्वेद में बनने वाले रिस्टों में खाड़ की भारी उपयोगिता रही है। इसमें कई तरह के विटामिन भी पाये जाते हैं। सिर में दर्द होने पर सुबह सूर्योदय से पहले इसका रस पीने से लाभ होता है। पेट के तमाम रोगों अथवा शरीर में पानी की कमी होने पर खाड़ का रस काफी लाभकारी होता है।

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