अभिनेत्री महिमा मकवाना इन दिनों सीरीज ‘मुसाफिर कैफे’ को लेकर सुर्खियों में हैं। हाल ही में उन्होंने अपने करियर सफर पर बात की। कुछ किरदार सिर्फ पर्दे पर नहीं रहते, कलाकार के भीतर भी बस जाते हैं। अभिनेत्री महिमा मकवाना के लिए ‘मुसाफिर कैफे’ की ‘प्रीति’ ऐसा ही किरदार रही। महिमा कहती हैं कि इस रोल ने उन्हें खुद को स्वीकार करना और खुद से प्यार करना सिखाया। अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने अपने करियर, इंटीमेट सीन्स, टीवी से फिल्मों तक के सफर और मसूरी में अपने डॉग के नाम पर ‘परिंदा कैफे’ खोलने के सपने पर खुलकर बात की। महिमा कहती हैं कि ‘मुसाफिर कैफे’ की स्क्रिप्ट पढ़ते ही उन्हें लगा कि वह प्रीति का किरदार निभाना चाहती हैं। ‘जब मैंने पहली बार स्क्रिप्ट पढ़ी, तभी मुझे लगा कि मुझे प्रीति ही बनना है। वह बहुत एस्पिरेशनल है। सोलो ट्रैवल करती है, अपने आसपास के लोगों को अपनापन महसूस कराती है, बहुत अच्छी लिस्नर है और बेहद इमोशनली इंटेलिजेंट है। अगर मुझे कभी असल जिंदगी में प्रीति मिले, तो मैं उससे दोस्ती जरूर करना चाहूंगी। वह ऐसी इंसान है, जो आपको रास्ता भी दिखाएगी और यह भी महसूस कराएगी कि आप अकेले नहीं हैं।’ महिमा के लिए ‘प्रीति’ सिर्फ एक रोल नहीं रही। वह मानती हैं कि इस किरदार ने उनकी निजी जिंदगी पर भी असर डाला ..’मुझे पहले खुद को स्वीकार करना बहुत मुश्किल लगता था। आसपास का शोर और लोगों की बातें कहीं न कहीं असर करती थीं। लेकिन प्रीति ने मुझे खुद को एक्सेप्ट करना सिखाया। उसने मुझे खुद से प्यार करना सिखाया। मुझे एहसास हुआ कि जब तक आप खुद को आजादी नहीं देंगे… तब तक आप अपने आसपास के लोगों को भी आजादी महसूस नहीं करा पाएंगे। मेरे लिए इससे बड़ा गिफ्ट कोई नहीं हो सकता। मैं यह सिर्फ फिल्म प्रमोट करने के लिए नहीं कह रही हूं। मुझे सच में लगता है कि प्रीति मेरे करियर का सबसे यादगार किरदार रहेगी।’ जिंदगी और करियर के इस सफर ने महिमा का नजरिया भी बदला है। वह कहती हैं कि उम्र के साथ हर सवाल का जवाब नहीं मिलता, लेकिन सोच जरूर बदल जाती है ‘मुझे लगता था कि 25-26 साल की उम्र तक सब कुछ समझ आ जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं होता। जिम्मेदारियां बढ़ती रहती हैं। जिंदगी में शोर हमेशा रहेगा। फर्क सिर्फ इतना है कि अब मैंने उसके बीच खुद को संभालना सीख लिया है। डर और इंसिक्योरिटी कई बार हमारे दिमाग में ऐसी कहानियां बना देते हैं, जो असल में होती ही नहीं हैं। इसलिए उन विचारों को ज्यादा ताकत नहीं देनी चाहिए। यह सुनने में थोड़ा फिलॉसॉफिकल लगता है, लेकिन यही मेरी रोज की प्रैक्टिस है।’ ‘मेडिटेशन ने मुझे जिंदगी के शोर से बाहर निकलना सिखाया’।
महिमा बताती हैं कि इस सीरीज की शूटिंग के दौरान उन्होंने मेडिटेशन शुरू किया और धीरे-धीरे इसका असर अपनी जिंदगी में महसूस किया ‘मैं यह नहीं कहूंगी कि मेडिटेशन ने मेरे जीवन का शोर पूरी तरह खत्म कर दिया, लेकिन उसने उसे काफी कम जरूर कर दिया। अब मैं खुद के पास जल्दी लौट पाती हूं।’

