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मध्यप्रदेश में सहकारिता की आड़ में गृह निर्माण सहकारी संस्थाओं की करतूत

Wednesday, November 9, 2022

/ by Today Warta



41 साल में एक भी संस्थापक सदस्य को नहीं मिला प्लॉट

 मध्यप्रदेश में सहकारिता की आड़ में गृह निर्माण सहकारी संस्थाओं में होने वाले जमीनों के घोटाले और इनमें प्लॉट खरीदकर अपना मकान बनाने का सपना पालने वाले लोगों के अंतहीन शोषण और संघर्ष की बात है। सरकार के तमाम दावों और घोषणाओं के बाद भी कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी में प्लॉट खरीदने वाले सदस्यों को ताकतवर भूमाफिया और सहकारिता विभाग के अफसरों की मिलीभगत के चलते बरसों लड़ाई लड़ने के बाद भी प्लॉट नहीं मिल पा रहे हैं। जधानी की गौरव गृह निर्माण सहकारी समिति इसकी जीवंत मिसाल है। करीब 41 साल पहले वजूद में आई इस समिति के 44 प्राथमिक सदस्यों में से 22 एक अदद प्लॉट के लिए संघर्ष करते-करते दुनिया से ही रुखसत हो चुके हैं। बाकी बचे 22 में से 4 सदस्यों को ही प्लॉट मिल पाया है, 18 अभी भी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। जबकि उनके हक के प्लॉट बिल्डर को बेच देने वाले समिति के घोटालेबाज पदाधिकारी का एफआईआर दर्ज होने के बाद भी बेखौफ खुलेआम घूम रहे हैं।

सीएम ने 2021 में दिए थे न्याय दिलाने के निर्देश

6 जनवरी 2021 को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सहकारी गृह निर्माण समीतियों के पीड़ित सदस्यों को न्याय दिलाने के निर्देश दिए थे। इसमें अफसरों को 18 महीने का समय दिया गया था। लेकिन नतीजा वही हुआ, ढाक के तीन पात। बाद में खुलासा हुआ कि राजधानी में रजिस्टर्ड 580 सहकारी गृह निर्माण सोसाइटियों में से 117 की जानकारी ही विभाग के पास है। यानी ज्यादातर संस्थाओं के कर्ताधर्ता ऑडिट तक नहीं कराते। इन सोसाइटियों में प्रॉपर्टी की ऐसी बंदरबांट की गई कि 1 हजार 780 पीड़ित सदस्य सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। डेढ़ साल तक चली इस कवायद का नतीजा ये निकला कि सहकारिता विभाग के अधिकारी किसी भी गुनहगार के खिलाफ एफआईआर तक दर्ज नहीं करा सके और सिर्फ एक पीड़ित को ही उसका हक दिला सके।

सहकारी गृह निर्माण संस्थाओं में घोटाला

सहकारी गृह निर्माण संस्थाओं के घोटाले को गौरव गृह निर्माण संस्था में हुए फर्जीवाड़े के जरिए समझा जा सकता है। इस संस्था की संपत्ति भोपाल के पॉश इलाकों में शामिल बावड़िया कलां में स्थित है। 1981 में 44 लोगों ने मिलकर गौरव गृह निर्माण सोसाइटी बनाई थी। संस्थापक सदस्य एमके हाजरा ने बताया कि संस्था ने बाबड़िया कलां गांव में 5 एकड़ जमीन खरीदी। लेकिन 42 साल बाद भी इन्हें अपनी ही सोसाइटी में प्लॉट नहीं मिला। मौजूदा स्थिति में 44 में से 22 सदस्यों का निधन भी हो चुका है। बाकी सदस्यों को फरवरी 2016 में सोसाइटी से ही बाहर निकाल दिया गया। अब 70-80 साल की उम्र में भी सदस्यों को संघर्ष करना पड़ रहा है।

सरकार बदली तो जागी उम्मीद

गौरव गृह निर्माण संस्था के एक और संस्थापक सदस्य गिरीश चंद्र दुबे ने बताया कि जब सूबे में 15 साल बाद सरकार बदली तो एक बार फिर गौरव गृह निर्माण संस्था के संस्थापक सदस्यों ने लड़ाई शुरू की। भ्रष्टाचार की सहकारिता के खिलाफ तमाम शिकायतों पर कमलनाथ सरकार ने जांच शुरू की थी। जिसका असर ये हुआ कि गौरव गृह निर्माण सोसाइटी में घोटाला करने वालों के खिलाफ शाहपुरा थाने में 2 एफआईआर दर्ज की गई थी। इस मामले में सबसे ज्यादा हैरानी की बात तो ये है कि फ्रॉड की धाराओं में मामले दर्ज होने के बाद भी पुलिस के हाथ आरोपियों के गिरेबान तक नहीं पहुंचे। किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हुई। सूत्र बताते हैं कि सहकारिता विभाग के अफसरों ने पुलिस जांच में सहयोग ही नहीं किया। जरूरी दस्तावेज भी नहीं सौंपे, लिहाजा खात्मा लगाने की नौबत आ गई।

2 पर FIR लेकिन किसी को भी नहीं किया गिरफ्तार

जनवरी 2020 में गौरव गृह निर्माण के पूर्व अध्यक्ष संतोष जैन, तत्कालीन अध्यक्ष अनीता बिष्ट, अंजली कुकरेजा, प्रेम सिंह जायसवाल, बिल्डर शिशिर खरे और मनोज सिंह मीक के खिलाफ 2 एफआईआर दर्ज की गई थीं लेकिन पुलिस ने किसी को भी गिरफ्तार नहीं किया। गिरीश चंद्र दुबे ने बताया कि डेवलपमेंट के नाम पर साल 1999 से 2010 तक गौरव गृह निर्माण के अध्यक्ष रहे। संतोष जैन ने बिल्डर मनोज सिंह मीक और शिशिर खरे के साथ अनुबंध किया था। इसी अनुबंध को आधार बनाकर बिल्डर ने गौरव गृह निर्माण समिति की आधी जमीन पर डुप्लेक्स बनाकर बेच दिए और दूसरी तरफ संस्थापक सदस्यों के प्लॉट नगर निगम में गिरवी रख दिए।

त्रिसदस्यीय जांच कमेटी में हुआ खुलासा, ऐसे बेचे गए प्लॉट

वर्ष 2007 से लेकर 2019 तक गौरव गृह निर्माण सोसाइटी के कुल 74 प्लॉटों की रजिस्ट्रियां की गईं। इनमें से महज 4 संस्थापक सदस्यों के नाम पर रजिस्ट्री की गई। बाकी प्लॉट 70 नए सदस्य बनाकर बेच दिए गए। इन प्लॉट्स की बिक्री से प्राप्त हुए करीब ढाई करोड़ रुपए भी सोसाइटी के खाते में जमा नहीं किए गए। उस राशि का भी तत्कालीन अध्यक्षों और बिल्डर ने गबन कर लिया। वर्ष 2016 से 2019 तक अनीता बिष्ट सोसाइटी की अध्यक्ष रहीं। इनके कार्यकाल में भी सोसाइटी के 16 प्लॉटों की रजिस्ट्रियां नए सदस्यों को करा दी गई और इससे अर्जित राशि का अनीता बिष्ट ने गबन कर दिया।

सहकारिता विभाग के उपायुक्त का जवाब

गौरव गृह निर्माण सोसाइटी के खिलाफ हुई तमाम शिकायतों पर तीन सदस्यीय जांच कमेटी से जांच कराई गई थी। इस जांच कमेटी में सीएसपी अनिल त्रिपाठी, एसडीएम राजेश श्रीवास्तव और सहकारिता के संयुक्त आयुक्त आरआर सिंह शामिल थे। यानी पुलिस, प्रशासन और विभाग के अधिकारियों की जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद भी आरोपियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो सकी। पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया, पुलिस जांच में सहकारिता विभाग के अधिकारियों ने ही दस्तावेज नहीं सौंपे, जिला प्रशासन रजिस्ट्रियां कैंसिल नहीं करा सका। एक तरफ जमापूंजी लगाकर प्रापर्टी के लिए ये बुजुर्ग जीवनभर से संघर्ष कर रहे हैं। दूसरी तरफ सहकारिता विभाग के उपायुक्त विनोद सिंह का कहना है कि ये कोई ज्वलंत मुद्दा नहीं है। उन्होंने रटा रटाया सा जवाब देते हुए कहा कि आवेदनों पर कार्रवाई की जाती है। 

संस्थाओं के घोटालों पर कमलनाथ सरकार ने लिया था एक्शन, जांच रिपोर्ट के 3 साल बाद भी कार्रवाई नहीं

राजधानी की संस्थाओं में हुए भ्रष्टाचार को लेकर कांग्रेस विधायक संजय यादव ने मार्च 2020 में विधानसभा में सवाल उठाया था। जिस पर तत्कालीन सहकारिता मंत्री डॉ. गोविंद सिंह ने जांच के आदेश दिए थे। सहकारिता अधिकारी छविकांत बाघमारे और सुधाकर पांडे ने जांच की। 24 फरवरी 2021 को सामने आई जांच रिपोर्ट में तमाम खुलासे हुए और गड़बड़ियां पकड़ी गईं। लेकिन सहकारिता के अधिकारियों ने रिपोर्ट को दबा दिया। 3 साल बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।

इन 7 संस्थाओं में हुई गड़बड़ियों के खिलाफ हुई जांच

गौरव गृह निर्माण सोसाइटी

महाकाली गृह निर्माण सोसाइटी

गुलाबी गृह निर्माण सोसाइटी

हेमा गृह निर्माण सोसाइटी

न्यू मित्र मंडल गृह निर्माण सोसाइटी

मंदाकिनी गृह निर्माण सोसाइटी

लाला लाजपत राय गृह निर्माण सोसाइटी

गिरोह बनाकर किए गए घोटाले

भोपाल की संस्थाओं में हुए फर्जीवाड़ों को लेकर आरोप लगते रहे हैं कि गिरोह बनाकर ये घोटाले किए गए हैं। जांच रिपोर्ट में इस बात का खुलासा भी हो गया। जांच में सामने आया कि एक ही व्यक्ति कई संस्थाओं में सदस्य है। जबकि सहकारिता के नियम के मुताबिक एक व्यक्ति एक ही संस्था में सदस्य रह सकता है।

दिनेश त्रिवेदी - मंदाकिनी, सितारा और महाकाली संस्था में सदस्य हैं।

अनीता बिष्ट भट्ट और पति संजय भट्ट - हेमा, महाकाली और गौरव संस्था में सदस्य हैं।

स्वप्निल तैलंग और पत्नी विनीता तैलंग - हेमा, महाकाली, सितारा और मंदाकिनी संस्था में सदस्य हैं।

विष्णु पटेल - हेमा, लाला लाजपत राय और महाकाली संस्था में सदस्य हैं। 

हरीशचंद्र - गुलाबी और सितारा संस्था में सदस्य हैं।

पवन - गौरव, हेमा और सितारा संस्था में सदस्य हैं।

संदीप सिंह राजपूत - महाकाली और गुलाबी संस्था में सदस्य हैं।

सुमन - हेमा और महाकाली संस्था में सदस्य हैं।

सहकारिता विभाग के पास लेनदेन की जानकारी नहीं

इन सोसाइटियों में पदाधिकारी और सदस्य रहते हुए इन लोगों ने न केवल प्लॉट लिए और बेचे बल्कि संस्थाओं के खाते से भी करोड़ों रुपए भी निकाले। ये लेन-देन क्यों किया गया, इसकी जानकारी सहकारिता विभाग के पास भी नहीं है। लेकिन तथ्य सामने आने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई, न ही इन सदस्यों को संस्थाओं से हटाया गया।

विधायक संजय यादव ने विधानसभा में उठाए सवाल

इस रिपोर्ट में ये बात भी साफ हो गई कि जांच में सहकारिता के अधिकारियों ने ही सहयोग नहीं किया और जांच दल ने भी अपनी रिपोर्ट में अधिकारियों को बचाने की कोशिश की। विधायक संजय यादव के विधानसभा में उठाए सवाल के आधार पर 4 बिंदुओं में जांच की गई थी। सवाल में महाकाली, गुलाबी, हेमा, न्यू मित्रमंडल, गौरव, मंदाकिनी और लाला लाजपत राय हाउसिंग सोसाइटी में हुए चुनाव और सदस्यों की जानकारी मांगी गई थी।

जांच कमेटी को नहीं दी गई जानकारी

चुनाव और सदस्यों के संबंध में संस्थाओं के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या प्रशासक ने जांच कमेटी को जानकारी ही नहीं दी। जबकि तीन गृह निर्माण सोसाइटियों में सहकारिता विभाग के अधिकारी ही प्रशासक थे। गौरव गृह निर्माण और लाला लाजपत राय गृह निर्माण सोसाइटी में आरएस उपाध्याय और हेमा गृह निर्माण संस्था में अशोक वर्मा प्रशासक नियुक्त थे।

जांच कमेटी के सदस्यों ने अपने विभाग के अधिकारियों को बचाया

सवाल ये भी था कि गौरव गृह निर्माण संस्था में सहकारिता विभाग के अधिकारी या उनके परिजन के नाम पर प्लॉट आवंटित किए गए है ? लेकिन इस सवाल की जांच करते हुए जांच कमेटी के सदस्य सुधाकर पांडे और छविकांत बाघमारे ने अपने विभाग के अधिकारियों को बचा लिया। रिपोर्ट में लिखा कि किसी भी अधिकारी ने अपने या परिजन के नाम पर प्लॉट नहीं लिया है।

प्रॉपर्टियों की बंदरबांट

सहकारिता उपायुक्त, जिला भोपाल के पद पर रहते हुए बबलू सातनकर ने अपनी पत्नी सुनीता सातनकर के नाम पर गौरव गृह निर्माण सोसाइटी में प्लॉट आवंटित करा लिया था। जिसकी रजिस्ट्री 21 जून 2017 में कराई थी। लेकिन 2020-21 में जांच कर रही कमेटी इस बात का पता नहीं लगा सकी। जांच दल के प्रभारी छविकांत बाघमारे का कहना हैं कि जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने के 6 महीने बाद उन्हें सातनकर की पत्नी के नाम पर लिए गए प्लॉट के बारे में पता चल सका। जांच रिपोर्ट में एक बार फिर ये बात ये सामने आई कि गौरव, हेमा, महाकाली और गुलाबी नगर गृह निर्माण संस्था को एक ही ऑफिस से चलाया जा रहा था। यानी गिरोह बनाकर प्रॉपर्टियों की बंदरबांट की गई। संस्थाओं में जमा राशि का गबन किया गया। रिपोर्ट में शाहपुरा थाने में फरवरी 2020 में दर्ज हुए मामले का हवाला दिया गया है।

 जब इस मामले की पड़ताल की तो पता चला कि फरवरी 2020 में दर्ज हुई एफआईआर पर 3 साल बाद भी पुलिस अपनी जांच पूरी नहीं कर सकी है। टीआई अवधेश सिंह भदौरिया ने बताया कि अनीता बिष्ट, दिनेश त्रिवेदी, नरेंद्र सोनी, राजकुमार चौरसिया, संदीप राजपूत, सुमन और विष्णु पटेल के खिलाफ धारा-420 और 34 के तहत मामला दर्ज किया गया था। लेकिन पुलिस अब तक विवेचना ही कर रही है। यानी एफआईआर दर्ज हो जाने पर भी गुनहगारों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती।

सबूत मिलने के बाद भी कार्रवाई नहीं करते जिम्मेदार

सहकारी गृह निर्माण संस्थाओं में हुए फर्जीवाड़ों के तमाम तथ्य सामने आ चुके हैं लेकिन जिम्मेदार कोई कार्रवाई नहीं करते। ऐसे में 70-80 साल की उम्र में भी प्लॉट के लिए संघर्ष कर रहे संस्थापक सदस्यों ने न्याय की उम्मीद ही छोड़ दी है। दूसरी तरफ जिम्मेदार पद पर बैठे हुए अधिकारी कार्रवाई करने की बजाय मीडिया को भी गुमराह कर देते हैं।  जब जांच रिपोर्ट पर कार्रवाई के संबंध में उपायुक्त विनोद सिंह से सवाल किया तो उन्होंने हाईकोर्ट के स्टे का हवाला दे दिया। जबकि हाईकोर्ट ने विधासनभा के सवाल पर हुई जांच पर कोई स्टे नहीं दिया है। विनोद सिंह को जब अपनी गलती का अहसास हुआ तो उन्होंने व्हाट्सएप पर मैसेज किया। उन्होंने कहा कि फाइल देखकर बताएंगे। लेकिन उसके बाद मिलने का समय ही नहीं दिया।

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