राजेंद्र प्रसाद मिश्र
बारा प्रयागराज ।ईश्वर को प्राप्त करने का सबसे सरल एकमात्र विकल्प है निष्काम भक्ति। अर्थात जो भी मनुष्य ईश्वर की भक्ति बिना किसी लालसा के करता है, उसका कल्याण हो जाता है और भौतिक लालसा से युक्त प्राणी की भक्ति फलदायिनी हो ही नहीं सकती। मनुष्यों को चाहिए कि ईश्वर की शरण में जब भी जाएं, अपने हृदय को काम, क्रोध, मद,लोभ एवं ईर्ष्या आदि बोझों को उतारकर जाएं, जब इन सभी से मन रिक्त रहेगा, तभी भक्ति प्रवाहित होती है। श्रीमद्भागवत कथा के छठवें दिन वृन्दावन से पधारे आचार्य विपिन कृष्ण शास्त्री ने कहा, भगवान से माँगने वाली नहीं, बल्कि निष्काम भक्ति की जानी चाहिये। उन्होंने श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त मीरा,सुदामा आदि का उल्लेख करते हुए कहा कि इन दोनों के अंतर्मन में कृष्ण के अतिरिक्त कुछ था ही नहीं। इन्होंने सोते-जागते,उठते-बैठते, खाते-पीते श्रीहरि के नाम का स्मरण किया, इसीलिए इनका उद्धार हुआ।
नगर पंचायत शंकरगढ़ के पटहट रोड स्थित संकट मोचन मन्दिर (स्वामी मार्केट) प्रांगण में कथा सुनने आये श्रोताओं से कहा, जहाँ श्रीकृष्ण, वहीं राधा हैं। प्रत्येक जीव को उसके ही कर्मों के अनुसार फल मिलता है।निजी स्वार्थ सिद्धि के लिए किए गए कर्म सिद्ध नहीं होते। इस अवसर पर रुक्मिणी-विवाह की मनमोहक झाँकी प्रस्तुत की गई, जिसमें सैकड़ों कस्बावासियों ने प्रतिभाग किया।भगवान श्रीकृष्ण का जयकारे लगाते हुए रामभवन चौराहे से बारात निकाली गई और सदर बाजार होते हुए कथास्थल पर समापन हुआ।इस दौरान नगरवासियों ने झाँकी पर पुष्पवर्षा कर स्वागत किया।

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