देश

national

जयन्ती विशेष: सत्यार्थ के प्रकाशदूत एवं दया के सागर थे स्वामी दयानन्द सरस्वती

Sunday, February 12, 2023

/ by Today Warta



राजीव कुमार जैन रानू

ललितपुर। महर्षि दयानंद सरस्वती की जयंती पर आयोजित एक परिचर्चा को संबोधित करते हुए नेहरू महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य प्रो. भगवत नारायण शर्मा ने कहा कि यूनान के महान दार्शनिक सुकरात ने कहा था कि मैं ऐथेन्स का डास (मच्छर) हूँ जो अपने शब्ददंशो से बराबर जनता को जगाये रखूंगा, उन्हें जरा भी झपकने नहीं दूंगा। यही काम भारत में आर्यसमाज के प्रवर्तक स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आजीवन किया। उनका नारा था कि वेदों की ओर फिर से लौटो। क्योंकि आसन्न त्रासद दशायें हमें यूटर्न लेकर सोचे-समझे मार्ग पर अग्रसर होने के लिए मजबूर कर रही हैं। प्रो.शर्मा ने आगे कहा कि वैदिक मार्ग से उनका तात्पर्य था कि जाति, धर्म, वर्ग, लिंग, सामाजिक- आर्थिक असमानता की वजह से भेदभावों के उफनते सागर को अद्वैत की वैदिक वाणी ही शान्त कर सकती है। उनका अटल विश्वास था कि मात्र श्रद्धा के आधार पर कुछ भी स्वीकार न करो। केवल और केवल सत्य के आधार पर जांचो और परखो। क्योंकि सत्य ही सबसे बड़ा गुण है और असत्य ही सबसे बड़ा पाप है। जब वे मात्र चौदह वर्ष के थे तब उनके शिवभक्त परिवार ने शिवरात्रि व्रत रखा और रात्रि जागरण भी किया जिसमें वे भी सम्मिलित हुए। परन्तु मध्यरात्रि के समय जब चूहे मूर्ति पर उछलने- कूदने लगे तब वे गुस्से से तमतमा उठे। परन्तु उन्हें स्थिरचित्त होने पर आत्मबोध जगा कि वेदवाणी असत्य कैसे हो सकती है? जबकि कण-कण में और जन-जन में निर्गुण निराकार अगोचर ब्रह्म व्याप्त है। वे जब कालान्तर में मथुरा जाकर गुरु विरजानन्द के आश्रम में पहुंचे तो विरजानन्द महाराज ने कहा कि अदृश्य ब्रह्म भले ही चर्मचक्षुओं से न दिखे किन्तु ज्ञान के चक्षु खोलो और चलते -फिरते सभी नर-नारियों में नारायण के दर्शन करो। उनकी डबडबाई हुई आँखों के एक-एक आँसुओं को पोछो, यही उपनिषदों, ब्रह्मसूत्र एवं गीता में प्रतिपादित वैदिक मार्ग का सार है। वे देशप्रेम और मानवप्रेम को एक ही सिक्के के दो पहलू मानते थे। अन्धविश्वासों और विवेकहीन रूढय़िों की चट्टान को चूर-चूर कर देने के लिए वे स्वर्णकार की हथौड़ी से मन्द-मन्द टिक-टिक नहीं करना चाहते थे, अपितु लौहकार के घन या एक ही गदाप्रहार की चोट से हटा देने के पक्षकार थे। छांदोग्य उपनिषद के इस श्लोक 68 को वे बारम्बार हृदयांगम करते हुए स्वीकारते थे कि वैदिक ज्ञान से बढ़कर और कोई नहीं यद्य-येनेत शुप्काय स्थाणवे ब्रूयात्, जायेरत्रेवास्मिन् शाखा:, प्रोरोहेयु: पलाशानीति यानि कि अगर यह (रहस्य) किसी एकाध सूखे ठूंठ को भी कहा जाये तो उसमें शाखाएं निकल आयेगीं, पत्ते फूट निकलेंगे।

Don't Miss
© all rights reserved
Managed by 'Todat Warta'