राजीव कुमार जैन रानू
ललितपुर। गोस्वामी तुलसीदासजी के साहित्य की वर्तमान में प्रासंगिकता विषय पर एक परिचर्चा को संबोधित करते हुए नेहरू महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य प्रो. भगवत नारायण शर्मा ने कहा कि भारतीय जनता के हृदयसम्राट गोस्वामी तुलसीदास ने समकालीन परिस्थितियों में व्याप्त घोर दरिद्रता को ही रावण मानते हुए उसके संहार को अपरिहार्य माना है। वे कहते हैं दारिद दशानन दबाई दुनि दीनबंधु अर्थात दरिद्रता का रावण पूरी दुनिया को दबाये हुए है जिसके चंगुल से हमें जनता को मुक्त करना होगा। बुन्देली धरती के जनजीवन में व्याप्त दारिद्रय को देखकर कदाचित वनवासी राम ने 14 वर्ष के वनवासी काल का अधिकांश समय चित्रकूट में ही रमे रहकर व्यतीत किया और दरिद्रता के रावण का समूल नाश करने हेतु बुन्देलखण्ड की धरती पर ही आगत रामराज्य के सपने को हकीकत में बदलने का आधार दिया। प्रो.शर्मा ने आगे कहा कि रावण संहार के विजयोत्सव पर जब समस्त जनता भगवान राम का जय जयकार कर उठी तो तुलसीदासजी कहते हैं कि तुमरे बल में रावण मारयो अर्थात अयोध्या से लेकर लंका तक फैले उनके संघर्ष में लोग जुड़ते रहे और कारवां जीत की ओर अग्रसर होता गया। लोकनायक तुलसीदासजी भगवान राम के इस प्रण को दोहराते हैं कि निश्चरहीन करोंमहि भुजउठाये प्रणकीन्ह क्योंकि जब तक मानवद्रोही शत्रुओं का खात्मा नहीं होगा, तब तक समता और न्याय आधारित रामराज्य की स्थापना नहीं होगी। इसलिए त्रेता की रामकथा के सहारे हमें आज की समस्याओं का समाधान करना होगा। तुलसीदासजी ने साफ-साफ आगाह किया कि जिस राजा या शासक के राज्य में प्रजा दुखी रहेगी, उसकी दुर्गति रावण और कौरवों के खानदान की तरह ही होगी। जो राज करत बिनु काज ही, करें कुचालि कुसाज, तुलसी ते दसकन्ध ज्यों, जइहें सहित समाज। तुलसी की भांति हमें अडिग विश्वास रखना होगा कि जनद्रोही तत्वों का अंत अपने आप नहीं जनता के संगठित पुरुषार्थ से ही होगा। तुलसी की रामकथा के इस मर्म को बुन्देलखण्ड की सामान्य जनता ने भलीभांति हृदयंगम कर लिया है इसलिए बड़े सटीक ढंग से यहां गाये जाने वाले लोकगीतों में कहा गया है। वन जाने हतो, रावण मारने हतो, रामराज लाने हतो, कैकेई खों वृथां दोष लगा दये?। गोस्वामी तुलसीदासजी के रामचरित मानस में अयोध्या काण्ड में जो वेदना का सागर लहराता हुआ दिखाई दे रहा है, सामंतीय समाज में उपेक्षितों की वास्तविक पीड़ा से ही उत्पन्न हुआ है। ध्यान देने की बात है कि तुलसी की भक्ति वर्ण, जाति, धर्म आदि के कारण किसी को बहिष्कृत और उपेक्षित नहीं करती। राम जब चित्रकूट पहुंचते हैं, कोल-किरातों से बीस पंक्तियों में राम से उनकी भेंट का वर्णन करते हुए, तुलसी यह टिप्पणी देते हैं। रामहिं केवल प्रेम प्यारा, जानि लेउ जो जाननि हारा। केवट और निषादराज के प्रसंग में नीचे समझे जाने वाले लोग राम को प्यार करके भरत और लक्ष्मण का दर्जा पा जाते हैं, तब सब लोग उसका इस तरह आदर करते हैं मानो लक्ष्मण आ गए हों। निरखि निषाद नगर नर-नारी, भए सुखी जनु लखन निहारी, विदा करते निषादराज से स्वयं राम कहते हैं, तुम मम सखा भरत सम भ्राता। रहे हु सदा पुर आवत जाता। तुलसी ने समता और न्याय आधारित रामराज्य लाने के लिए सामंतीय युग में भक्ति (प्रेम) के आधार पर जो किया वही कार्य आज के लोकतांत्रिक युग में पुनर्जागरण के आधार पर जनता कर रही है। तुलसीदास जानते थे कि नहिं दरिद्र सम दुख जगमाहीं उन्होंने स्वयं भोगा था। आग बड़वाग्नि से बड़ी है, पेट आग की। मानवतावादी प्रेम में डूबी तुलसी की भक्ति, शक्ति का ऐसा अमोघ अस्त्र है, जो संघर्षरत जनसामान्य को हताश-निराश नहीं होने देगी। केवट दुखी और उत्पीड़ित कोटि कोटि मानवों के सच्चे प्रतिनिधि हैं, जो निर्बल के बल आशाओं के केन्द्र भगवान राम के प्रति सब ओर से निराश होकर आशा भरी दृष्टि से निहार रहा है क्योंकि वह भलीभांति जानता है कि न्याय और अन्याय के संघर्ष में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम कभी तटस्थ नहीं रहते, हमेशा पतित पावन कमजोरों के पक्ष में खड़े हो जाते हैं। महात्मा तुलसीदास अपने युग के सबसे बड़े लोकनायक थे। उनकी भक्ति समाज से सन्यास लेते हुए भी समाजसापेक्ष थी। उन्होंने अपने प्रख्यात ग्रन्थ कवितावली में रामचरितमानस के अत्यन्त मार्मिक प्रसंगों को कवित्त शैली में प्रस्तुत किया है। गोस्वामी तुलसीदास के युग में आज की कोरोना महामारी से भी भयंकर दारुणदशा का चित्रण करते हुए दीन-हीन जनों के छिनते रोजगार और असमय में जीवन से हाथ धोने जैसी त्रासद स्थितियों से रूबरू किया है यथा। एक तौ कराल कलिकाल सूल-मूल, तामें कोढ़मेंकी खाजु-सी सनीचरी है मीनकी। बेद-धर्म दूरि गए, भूमि चोर भूप भए, साधु सीद्यमान जानि रीति पाप पीनकी। दूबरेको दूसरो न द्वार, राम दयाधाम। रावरीऐ गति बल-बिभव बिहीन की। लागैगी पै लाज बिराजमान बिरुदहि, महाराज! आजु जौं न देत दादि दीनकी। अर्थात-एक तो सारे दुखों का ऐसा भयंकर दुकाल और उसमें भी कोढ़ में खाज के समान मीन राशि पर शनिश्चर की स्थिति। वे कहते हैं कि वेद धर्म लुप्त हो गये हैं, लुटेरे ही राजा महाराजा बन गये हैं तथा बढ़ते हुए पाप की गति देखकर साधुसमाज दुखी है। वे दीनानाथ से विनय करते हैं कि हे दया के धाम भगवान राम कमजोर या दुर्बल जनों के लिए आपको छोड़ कोई दूसरा द्वार नहीं है। बल वैभवशून्य जनता के लिए सिर्फ एकमात्र आपकी ही गति है। उक्तानुसार महामारी से उत्पन्न दारुणदशा और उसके निदान हेतु जननायक गोस्वामी तुलसीदासजी के गीतों के मार्मिक स्थल प्रस्तुत आगे भी किए जायेंगे जिनमें रोग को भगाने और जन-जन को जगाने हेतु सहृदय कवि ने अपनी मार्मिक अपील की है। 16 वीं शताब्दी में तुलसीदास जी के जमाने में देश में एक ओर घातक रोग का विशेष रूप से भगवान शंकर की नगरी वाराणसी में भयंकर प्रकोप चल रहा था और दूसरी ओर उसका भयंकर परिणाम तुलसीदास जी द्वारा रचित कवितावली में वर्णित उनके शब्दों में हालात इतने बद से बदतर हो रहे थे कि खेती न किसान को, भिखारीको न भीख, बलि, बनिकको बनिज, न चाकरको चाकरी। जीविका बिहीन लोग सीद्यमान सोच बस, कहैं एक एकन सों कहाँ जाई, का करी? बेदहूं पुरान कही, लोकहूँ बिलोकिअत, साँकरे सबै पै, राम! रावरें कृपा करी। दारिद-दसानन दबाई दुनी, दीनबंधु! दुरित-दहन देखि तुलसी हहा करी। अर्थात मानवतावाद के सबसे बड़े प्रवक्ता तुलसीदासजी का कहना है कि किसान खेती से हाथ धो बैठे हैं, भिखारियों को भीख तक नसीब नहीं है, दुकानदारी बिल्कुल ठप्प है, नौकर भी अपनी नौकरी से हाथ धो बैठे हैं। जीविका के संकट का समाधान दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रहा है। निरूपाय और असहाय जनता की आँखों के आगे इतना अँधेरा छा गया है कि कहाँ जायें? और क्या करें? वेद-पुराण शुरु से ही कहते आ रहे हैं कि आपके अलावा संकट को कोई दूर नहीं कर सकता। क्योंकि आपने सदैव जनता को परेशानियों से मुक्त किया है। आपको फिर दरिद्रता के दशानन जिसने पूरी दुनिया को जकड़ रखा है, हे निर्बल के बल राम जनता के हाहाकार को सुनो और उसका संहार करके जनविजय का मार्ग प्रशस्त करो। लगभग आज से 450 वर्ष पहले ऐसी पीड़ा और अपने दिल की गहराईयों से बाबा तुलसी ने जो आत्मनिवेदन कौशलाधीश प्रभु श्रीराम से किया है, उस घोर दारिद्र को स्वयं कवि ने अपने बचपन से भोगा था। संसार से व्यथित होकर उन्होंने बिल्कुल सही कहा कि विशाल समुद्र की तलहटी में जो आग छिपी है वह उतनी बड़ी नहीं है जितनी कि जन-जन की पेट की आग है। वे सर्वसमर्थ राम से अपनी आँखों में आँसू भरकर कहते हैं तुम जनि मन मैलो करो, लोचन जनि फेरो यानि हे प्रभु अगर तुम्हीं मन मैला करके जनता से आँख फेर लोगे, तो उसे डूबने से कौन बचायेगा। राम उनके लिए आशाओं का केन्द्र बन गये। अपमान और लांछन का मुकाबला करने के लिए एक अस्त्र बन गए। जब वे लोगों को दूसरों के सामने हाथ फैलाते हुए देखते हैं तो वे मना कर देते हैं और वे ललकारते हुए कहते हैं जिन डोलहि लोलुप कूकर, ज्यों, तुलसी भजु कोसल राजहिं रे अर्थात जन-जन को संगठित करके अपने युग के महानायक जैसे भगवान राम ने समता और न्याय आधारित ऐसे रामराज्य की स्थापना की थी कि जहाँ न तो किसी को रोग होता था और न ही किसी की असमय मृत्यु होती थी। अल्पमृत्यु नहि कबनिउँ पीरा। सब सुन्दर सब बिरुज सरीरा। नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना। वस्तुत: तुलसीदासजी वैश्विक विभूति थे। उनके विचार, वर्णित मनोदशाओं का एकसा अनुभव संसार भर के सभी प्रेमी समान रूप से करते हैं। रूसी भाषा के महान कवि और दार्शनिक वारन्निकोव ने तुलसीकृत रामायण और विनयपत्रिका का रूसी भाषा में पद्यानुवाद किया है। अंतिम सांस लेने से पूर्व उन्होंने अपने पूत्र से कहा था मेरी समाधि पर बालकाण्ड का यह दोहा जरूर अंकित करा देना। भलौ भलाई पै लहै, लहै, निचाई नीचु। सुधा सराहहि अमरता, गरल सराहहि मीचू। जिसका अभिप्राय स्पष्ट है कि वास्तव में संसार में दो ही जातियां हैं, एक बहुसंख्यक अच्छों की दूसरी मु_ी भर बुरों की। अमृत और विष की तरह उनकी पहचान अमरता और मरणता के अपरिहार्य परिणाम में सन्निहित है।

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