कमल सिंह
बांदा- तीमारदारों के कुछ कहने पर चिकित्सक, कर्मचारी देते हैं घुड़की रानी दुर्गावती मेडिकल कालेज के हाल बेहाल हैं। यहां मरीजों को दवा की जगह दर्द मिलता है। इससे मरीज परेशान हैं। यहां की व्यवस्था सुधारने वाला कोई नहीं है। न तो मरीजों को समय से उपचार मिल पा रहा है और न ही दवाएं मिल पा रही हैं। इमरजेंसी में भर्ती होने वाले मरीजों को वहां पर मौजूद चिकित्सक बाहर की दवा लाने की पर्ची थमा देते हैं। मरीज के तीमारदार दवा लाते-लाते परेशान हो जाते हैं। तीमारदारों का कहना है कि एक इंजेक्शन लाने में कम से कम 15 से 20 मिनट का समय लग जाता है। जब तक मरीज की जान पर बन आती है। यहां के जिम्मेदार इस ओर कोई ध्यान नहीं देते। तीमारदारों का आरोप है कि नर्सों व चिकित्सकों से कुछ कहो, तो चिकित्सक या अन्य स्टाफ उल्टा घुड़की देकर तीमारदारों की जुबान बंद कर देते हैं।
रानी दुर्गावती मेडिकल कालेज की व्यवस्था बेपटरी हो गई है। इमरजेंसी में भर्ती होने वाले मरीजों को कोई देखने वाला नहीं है। खासकर सीजर में पड़ी महिलाओं के हाल बेहाल हैं। यहां की व्यवसथा जूनियर रेजीडेंटों के भरोसे चलती है। विशेषज्ञ प्रोफेसर कभी झांकने तक नहीं आते। आलम यह है कि इमरजेंसी में भर्ती मरीजों के तीमारदार ने बताया कि यहां पर भर्ती मरीजों को कोई देखने नहीं आता। मरीज को अगर दर्द हुआ तो नर्सें और डाक्टर घुड़की देकर भगा देते हैं। एक इंजेक्शन तक नहीं लगाते। ज्यादा कुछ कहो तो डाक्टर मरीजों के तीमारदारों को बाहर से दवा लाने की पर्ची थमा देते हैं। इमरजेंसी से मेडिकल स्टोर काफी दूरी पर है। जब तक तीमारदार दवा लेकर लौटते हैं, तब तक मरीजों की हालत बद से बदतर हो जाती है। तीमारदार बताते हैं कि इमरजेंसी में मरीजों की खासी फजीहत रहती है। बताया कि मरीजों को रात में नींद की गोली लिख दी जाती है। कुछ मरीज तो सो जाते हैं लेकिन कुछ मरीजों के लिए घातक साबित होती है। यह दवा भी बाजार से लानी पड़ती है।
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मेडिकल कालेज में नहीं है उल्टी का इंजेक्शन
बांदा। मेडिकल कालेज की इमरजेंसी में दवाइयों का भंडार है। लेकिन मरीजों पर इस्तेमाल नहीं की जाती। डाक्टर छोटा से छोटा इंजेक्शन बाहर से मंगवाते हैं। तीमारदार ने बताया कि मरीज को उल्टी हो रही थी। इमरजेंसी में उल्टी रोकने का इंजेक्शन तक नहीं था। डाक्टर ने मरीज के तीमारदार को उल्टी का इंजेक्शन पेरीनार्म बाहर से लाने के लिए पर्ची थमा दिया। इतना ही नहीं तमाम तरह की दवाइयां इमरजेंसी में बाहर से मंगाई जाती हैं। एक-एक मरीज से 500 से लगाकर एक हजार रुपए तक की दवाइयां मंगाई जा रही हैं। जिम्मेदार इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं। यहां की व्यवस्थाएं पूरी तरह से लडत्रखड़ाती जा रही हैं।
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स्टेचर के लिए घंटों करनी पड़ती है मशक्कत
बांदा। कहने को तो मेेडिकल कालेज है, लेकिन सुविधाएं बिल्कुल नहीं हैं। इमरजेंसी में आने वाले मरीजों को स्टेचर उपलब्ध नहीं हो पाती। मरीज के तीमारदार अपने मरीजों को गोद में लादकर इलाज कराने के लिए ले जाते हैं। बबेरू कस्बा निवासी हैदर ने बताया कि उसकी बहन छत से गिर गई थी। जिला अस्पताल से सीटी स्कैन कराने के बाद उसे रिक्शे से लेकर मेेडिकल कालेज आए। घंटों इंतजार करते रहे, लेकिन स्टेचर नहीं मिला। बाद में वह अपनी बहन आसमां को गोद में उठाकर इमरजेंसी में ले गया। वहीं नरैनी कोतवाली क्षेत्र के खरौंच गांव निवासी मेड़वा ने बताया कि उसका पुत्र अरविंद गिर गया था। उसका पैर फ्रैक्चर हो गया था। उसका इलाज जिला अस्पताल में होता रहा। डाक्टरों ने मेडिकल कालेज के लिए रेफर कर दिया। उसे सरकारी एंबुलेंस से मेडिकल कालेज लाया गया। घंटों इंतजार करते रहे लेकिन स्टेचर नहीं मिला। वहीं गुढ़ाकलां की रहने वाली महिला क्षय रोग से ग्रसित थी। उसे गंभीर हालत में मेडिकल कालेज में भर्ती कराया गया। हालत में सुधार न होने पर डाक्टरों ने उसे घर ले जाने की सलाह दी। तीमारदार काफी देर तक स्टेचर और व्हील चेयर के लिए परेशान रहे। बाद में तीमारदार मरीज को चद्दर में लिटाने के बाद दोनो कोने पकड़कर इमरजेंसी के बाहर तक लाए और अपने वाहन से घर ले गए।
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क्या कहते हैं जिम्मेदार
बांदा। रानी दुर्गावती मेडिकल कालेज के प्राचार्य डा. एसके कौशल ने बताया कि फिलहाल उन्होंने दो-तीन दिन पहले ही चार्ज संभाला है। दवा बाहर से मंगाए जाने का मामला उनके संज्ञान में नहीं आया है। रही बात स्टेचर न मिलने की, वह व्यवस्थाओं को दुरुस्त करवाएंगे। दोषी पाए जाने पर संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई भी करेंगे।

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