राकेश केशरी कौशाम्बी। दशकों पूर्व सर्व सुलभ जल स्त्रोत माने जाने वाले कुएं आज विलुप्त हो चुके है। लोगों के संपन्नता एवं दानशीलता की निशानी मानें जाने वाल कुएं अब हैं भी तो राजस्व अभिलेखों में पैमाइश के लिये महज एक बिन्दु बनकर रह गये हैं। इतिहास पर नजर डालें तो कुओं का अस्तित्व मानव सभ्यता के उदय के साथ ही जुड़ा हुआ दिखायी देता है। सिधु व मेसोपोटामिया की सभ्यताओं के वैभवशाली होने के साक्ष्य भी वहां के कुओं से प्राप्त होते हैं। यह अपनी बहुआयामी उपयोगिता के कारण काफी महत्वपूर्ण मानें जाते थे। यद्यपि कुएं की पहली प्राथमिकता व उपयोगिता लोगों की प्यास बुझाने के लिए थी। कृषि एवं संस्कार कार्यक्रमों में भी इसकी उपयोगिता कम नहीं थी। किसी घर में जब भी शादी-विवाह पड़ता लोग बारात विदा करते समय कुएं की फेरी लगाते हैं। धार्मिक आयोजनों में कुएं का जल पवित्र माना जाता था। उक्त के अतिरिक्त गांवों के सौहार्द को मजबूत करने के प्रमुख साधन भी यह थे, जहां से लोगों के घरों को पानी जाता था। गांव के सम्पन्न व्यक्ति अपने दरवाजे पर सुन्दर कुआं बनवाते थे, साथ ही साथ मन्दिर धर्मशाला या अन्य सार्वजनिक स्थानों पर कुएं बनवाना परम पुनीत कार्य मानते थे। समाज में जिस व्यक्ति को असामाजिक कार्यों के लिए दण्डित किया जाता उसे इस पर चढने तक नहीं दिया जाता था। सेवानिवृत अध्यापक 70 वर्षीय राममिलन कुशवाहा का कहना है कि आज लोग पानी उबाल के पीने की सलाह देते हैं। पर कुएं के पानी को ऊबालने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। सूर्य किरणों से इसका पानी खुद-ब-खुद पक जाता था जो पीने में मीठा व स्वास्थ्य वर्धक होता था। बरसात के पानी के संचय का यह एक महत्वपूर्ण केन्द्र भी हुआ करते थे। ग्रामीणो का कहना है कि विलुप्त हो रहे कुओं को बचा कर इसे प्रमुख जल स्त्रोत के रुप में भी प्रयोग में लाया ला सकता है।

Today Warta