राकेश केसरी
देबी मंदिरो व पूजा पण्डालो में भक्तो की रही भारी भीड
कौशाम्बी। जिलें के कडाधाम स्थित मांता शीतला मंदिंर,मंझनपुर स्थित दुर्गा मंदिर,पश्चिमशरीरा स्थित झारखण्डी मांता मंदिर सहित अन्य देबी मंदिंरो व पूजा पंण्डाल में नवरात्र पर्व के दूसरे दिन देबी भक्तों ने माँ ब्रह्मचारिणी स्वारूप की पूजा-अर्चना की। देबी पुराण के अनुसार ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली। इनके दाहिने हाथ में जप की माला एवं बाएँ हाथ में कमण्डल रहता है। माँ दुर्गा जी का यह दूसरा स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनन्तफल देने वाला है। इनकी उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। जीवन के कठिन संघर्षों में भी उसका मन कर्तव्य-पथ से विचलित नहीं होता। माँ ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से उसे सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन इन्हीं के स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन स्वाधिष्ठान चक्र में शिथिल होता है। इस चक्र में अवस्थित मनवाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है। इस दिन ऐसी कन्याओं का पूजन किया जाता है कि जिनका विवाह तय हो गया है लेकिन अभी शादी नहीं हुई है। इन्हें अपने घर बुलाकर पूजन के पश्चात भोजन कराकर वस्त्र, पात्र आदि भेंट किए जाते ---------------
मां ब्रह्मचारिणी का इस तरह हुआ अवतरण
पूर्वजन्म में इस देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था,और नारद जी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी।. इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात ब्रह्मचारिणी नाम से जाना गया।.एक हजार वर्ष तक इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया। कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे. तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं. इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए. कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं, पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया। कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया, देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया,सराहना की और कहा-हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की,यह आप से ही संभव थी,आपकी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्रमौलि शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे. अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ,जल्द ही आपके पिता आपको लेने आ रहे हैं, मां की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए. मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्व सिद्धि प्राप्त होती है।
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माँ दुर्गा की आराधना में डूबें लोग
शारदीय नवरात्र शुरू होने के साथ ही जनपद मुख्यालय मंझनपुर सहित ग्रामीण आंचलों में लोग माँ दुर्गा की आराधना में डूबे हुए है। नवरात्र के अनुष्ठान और दशहरा पर्व को लेकर बाजारों में रौनक छायी हुई है। नगर,कस्बो व ग्रामीण क्षेंत्र में मां दुर्गा के स्थापित करीब एक हजार पूजा पण्डालों में जयकारों की गूंज सुनाई दे रही है। जिले के कड़ा स्थित 51वीं शक्तिपीठ माता शीतला के मन्दिर सहित तमाम देवी मन्दिरों की विशेष सजावट और साज.सज्जा की गई है,जो आकर्षण का केन्द्र बनी हुई है। देवी पण्डालों में भारी भीड़ जुटने के मद्देनजर सुरक्षा के भी व्यापक प्रबन्ध किये गये है। शारदीय नवरात्र में श्रद्धालु पूरी तरह मातारानी की भक्ति में रम गये हैं। पूजा.पाठ,भजन.कीर्तन और व्रत.उपवास कर माँ दुर्गा की उपासना की जा रही है। रात में मातारानी के दरबारों में संगीतमयी आरती की जा रही है। मातारानी के दरबार आकर्षक विद्युत साज.सच्चा से जगमगा रहे हैं। देवी पण्डालों में अंगना पधारो महारानी,म्हारी शारदा भवानी,सहित अन्य गरबा गीतों पर देर रात तक आराधिकाओं के कदम थिरक रहे हैं। महिलायें,युवतियाँ और बालिकायें आकर्षक परिधानों में सज.धजकर देवी पण्डालों में पहुँच देवी माँ की उपासना कर रहीं है। चहुँओर नवरात्र उत्साह का उल्लास छाया हुआ है। नगर,कस्बें व ग्रामीण इलाको के प्रमुख गली.चैराहों और मोहल्लों में की गई विद्युत साज.सच्चा सभी का मनमोह रही है। देवी दरबारों में सुबह से लेकर देर रात तक श्रद्धालुओं का ताता लग रहा है। सजाये गये देवी पण्डालों में विराजी माँ के दरबारों में पहुँचकर श्रद्धालु अपने परिवार की सुख.समृद्धि की कामना कर मन वाछित फल पाने की प्रार्थना कर रहे है। माँ के जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया है। शाम के समय आरती के पश्चात महिलाओं के द्वारा देवी गीतों का आयोजन किया जा रहा है,जो देर रात तक जारी रहता है।

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