राकेश केसरी
कौशाम्बी। नौनिहालों का बचपन चाय-पान की दुकान से लेकर ईट भट्टों पर निर्भर हो गया है। यहां वे बाल मजदूर बनकर अपना व परिजनों का भरण-पोषण कर रहे हैं। इससे बाल श्रम कानून का उल्लंघन भी हो रहा है, लेकिन विभागीय अधिकारी चुप्पी साधे हैं। बाल मजदूरों का क्षेत्र में कई तरह से शोषण हो रहा है, जिसे विभागीय अधिकारियों के अतिरिक्त प्रशासनिक अधिकारी भी देख रहे हैं। क्षेत्र में चाय की दुकानों,होटलों,ईट भट्टों,कल कारखानो आदि के अलावा तमाम संस्थानों में बाल मजदूरों से कार्य कराया जा रहा है। चाय व होटलों पर तो बाकायदा इनका नामांकरण भी छोटू के नाम से कर दिया गया है। इन बाल मजदूरों की उम्र तकरीबन 10 से 14 वर्ष की होती है। जिन हाथों में इस समय किताब और पढ़ाई का बोझ होना चाहिए। उस उम्र में इन हाथों में मजबूरन छीका है। इन्हें तो शायद शोषण शब्द का अर्थ भी न पता हो,जो लगातार इनके साथ हो रहा है। ये चाय की दुकानों एवं होटलों में कप-प्लेट गिलास और बर्तन धुलाई भी करते हैं। जरा सी चूक हुई तो मालिक की धौंस के साथ एक.दो थप्पड़ भी पा जाते हैं। यह सब खुलेआम होता है, फिर भी किसी को उनका दर्द सुनाई नहीं पड़ता। बाल मजदूर कभी.कभी हाथों में झोला टांगे बूट पॉलिश करते नजर आते हैं और प्रशासन के जिम्मेदार इन्हीं बच्चों से पॉलिश भी करा लेते हैं। श्रम प्रवर्तन अधिकारी कहते हैं कि बाल श्रम पर रोक लगाने के लिए प्रभावी कदम उठाए जा रहे हैं। इसके लिए औचक छापामारी की जा रही है।

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