राकेश केशरी
कौशाम्बी। भारतेन्दु हरिश्चंद्र की यह पंक्तियां उस दौर में जितनी प्रासंगिक थी आज भी उतनी ही है, वक्त भले ही बदला,किन्तु रोटी का जुगाड़ करने वालों के हालात नहीं। हलाकि मानव ने तरक्की के कई सोपान पार किए पर इसके साथ.साथ अमीर व गरीब के बीच की खाई और भी चैड़ी हो गई। नतीजतन अमीर और अमीर व गरीब और गरीब होता गया। बैंकों के रवैये,फसलों पर मौसम की मार,बीमारी और यहां तक की बेटे व बेटी की शादी के लिए पैसे के जुगाड़ को गरीब के कदम आज भी साहूकार की दर को बढ़ते हैं। फिर शुरू होता है सूद का कुचक्र जिसमें मुठ्ठी भर पैसों के लिए रखी गिरवी संपत्ति को गंवाने के बाद भी कर्ज नहीं चुका पाते और जिंदगी पर सूदखोर के बंधुआ मजदूर हो जाते हैं गरीब। कुछ ऐसा ही है इस जिले का हाल है। गौरतलब है कि गरीब आखिर क्या करे। बैंक आसानी से ऋण देते नहीं। ऐसे में साहूकार एवं सूदखोरों की दर की ओर कदम बढ़ ही जाते हैं। जिले में तीन हजार से अधिक ऐसे दर है जो सेठ बन भारी.भरकम तीन से 5 प्रतिशत मासिक ब्याज पर पैसा दे रहे हैं, जबकि 14 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर से कर्ज बांटने का विधान है। ऐसे लाइसेंस मात्र दो दर्जन के पास ही है। जिले की जनसंख्या का आंकड़ा 18 लाख को पार कर गया है। लगभग 8 वर्ष पूर्व केन्द्र सरकार के सांख्यिकी एवं क्रियान्वयन मंत्रालय के निर्देश पर सर्वे कराया गया,जिसमें चयनित उपखंडों में परिवारों से आय.व्यय संबंधी ब्यौरे के संग यह पता चला कि कितने लोग साहूकारों के कर्जदार हैं। हालांकि,यह सीमित एरिया का सर्वे था किन्तु इसके आधार पर जिले में बैंकों के अतिरिक्त कर्जदार लोगों की अनुमानित संख्या एक लाख के आसपास है। विभिन्न रोजगारपरक योजना व किसानों को कर्ज देने के लिए केसीसी,फसली ऋण आदि के माध्यम से बैंक जरूरतमंदों को कर्ज देते हैं किन्तु सभी जानते हैं कि इसका लाभ उनको नहीं मिल पाता जो भूमिहीन या मकानहीन हैं। ऐसे लोग अचानक आई आर्थिक जरूरत की पूर्ति को साहूकारों के दर पर पहुंच जाते हैं। जबकि विधिवत रुप से कर्ज बांटने का लाइसेंस प्रशासन द्वारा दिया जाता है। इसमें शर्त है कि साहूकार अधिकतम 14 प्रतिशत ब्याज दर पर पैसा बांट सकता है। साहूकारी लाइसेंस की बाकायदा फीस जाती है और प्रतिवर्ष नवीनीकरण भी कराना होता है। केवल इतना ही नहीं 3 माह में बांटे गए कर्ज व कर्जदार की बंधक रखी संपत्ति का समस्त ब्यौरा देना होता है। चूंकि,इसमें मुनाफा व पारदर्शिता ज्यादा है लिहाजा सेठ बगैर लाइसेंस के ही पैसा बांटते हैं। यही वजह है कि जिले में लाइसेंस धारकों की संख्या सिर्फ दो दर्जन के आसपास है। जबकि ऐसे लोगों की संख्या तीन हजार से भी अधिक है जो 3 प्रतिशत मासिक ब्याज दर से कर्ज दे रहे हैं। चूंकि, बंधक संपत्ति के संबंध में कर्जदार व साहूकार के अलावा किसी को जानकारी नहीं होती लिहाजा तमाम मामलों में बंधक वस्तु, जमीन व मकान को अपने नाम करा लेते हैं। जिले में सैकड़ों ऐसे सूदखोर हैं जो दबंगई के बल पर पांच से दस प्रतिशत तक मासिक ब्याज वसूलते हैं। हालत यह है कि कर्जदार को दी गई रकम साल सवा साल में ही दुगनी हो जाती है। ऐसे सूदखोर वाहुबल से कर्जदारों के मकान व जमीन का बैनामा तक अपने नाम करा लेते हैं। यही नहीं शिकायत करने पर अंजाम भुगतने की गंभीर धमकी दी जाती है सो कर्ज में डूबा व्यक्ति सबकुछ चुपचाप सहन करता है। प्रशासन भी अभी तक इस ओर ध्यान देना मुनासिब नहीं समझा है। इस संबध में अपर जिलाधिकारी जयचन्द्र का कहना है कि जल्द ही गैर लाइसेंसी सूदखोर का सर्वे कराकर कार्यवाही अमल में लाई जाएगी।

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