इन्द्रपाल सिंह प्रिइन्द्र
ललितपुर। यहां तो कागज पर बनाना मुश्किल है हमारे पुरखों ने पत्थरों को काट कर बना दिया। बात कर रहे है बुंदेलखंड की चन्देलों की जिनकी कीर्ति के अनेक शिलालेख हैं। देवगढ़ के शिलालेख में चन्देल वैभव इस प्रकार दर्शाया है। ऊँ नम: शिवाय। चान्देल वंश कुमुदेन्दु विशाल कीर्ति ख्यातो बभूव नृप संघनताहिन पद्म:। चन्देलों के प्रमुख स्थान खजुराहो, अजयगढ़, कलिंजर, महोबा, दुधही, चांदपुर आदि हैं। हमारी वैभवपूर्ण पुरा संपदा आज उदासीनता के चलते, पाश्चात्य संकृति के नकली चोले में शनै: शनै: विलुप्त हो रही हो। विश्व धरोहर सप्ताह में बुंदेलखंड टेल्स के संस्थापक एड. पुष्पेंद्र सिंह चौहान के साथ पुरा संपदा की बात में बताते है कि हमारे जनपद ललितपुर से 30 किलोमीटर दूर चांदपुर - जहाजपुर में विंध्याचल पर्वत श्रंखलाओं के बीच चंदेल कालीन पुरातत्व एवं प्राचीन संपदाएं बिखरी पड़ी है। यहां मंदिरों में देवी-देवताओं की मूर्तियां आज भी अपने आप में लोक गाथाओं को संजोए हुए हैं। उन्ही में से एक विशिष्ट शैली से सहस्त्रलिंगेश्वर मंदिर यहां बिखरी पुरा संपदा का सबसे बड़ा मंदिर है। यह मंदिर पूर्व की ओर मुख करके एक तालाब के किनारे स्थित है। इसमें गर्भगृह और मुख मंडप शामिल हैं। गर्भगृह सहस्र लिंग (एक लिंग पर उकेरे गए हजारों लघु लिंग) को चारों दिशाओं में चार प्रक्षेपित आकृतियों के साथ स्थापित किया गया है। गर्भगृह इतना विशाल है कि भक्तों द्वारा परिक्रमा की जा सकती है। गर्भगृह के द्वार के शीर्ष भाग के केंद्र में भगवान नटराज की प्रतिमा है। गर्भगृह के सामने नंदी आवास। सहस्त्रलिंगेश्वर मंदिर के दक्षिणी हिस्से में भगवान ब्रह्मा को समर्पित एक आंगन के साथ सपाट छत वाला मंदिर है। गर्भगृह में भगवान ब्रह्मा की एक बैठी हुई छवि उनकी गोद में उनकी पत्नी के साथ है, लेकिन शीर्ष भाग में केंद्रीय आकृति भगवान विष्णु अपनी पत्नी के साथ हैं। तीसरा मंदिर भगवान गणेश को समर्पित है। इस मंदिर का केवल बरामदा ही बचा है। यहां रेलवे गेट के पूर्व की ओर चांदपुर और पश्चिम की ओर जहाजपुर स्थित है। सहस्त्रलिंगेश्वर मंदिर में स्थित सहस्त्रालिंग आज भी जाग्रत अवस्था में विद्यमान है जिसे आप महसूस कर सकते हैं अगर एक विशेष योजना बनाकर पुरातत्व विभाग, सरकार, सामाजिक संगठन इस क्षेत्र को गोद ले तब शायद कुछ हद तक हम इन मंदिरों के पुरा वैभव को वापस पास सकते हैं।

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