राकेश केशरी
कौशाम्बी। नशे में डूबे बचपन को कौन व कैसे छुटकारा दिला पायेगा। यह तो ऊपर वाला ही जाने लेकिन नशे की लत में फंसा ये बचपन, जीवन की पहली दहलीज पार करते ही अपराध की दुनिया में कदम रख देता है और फिर बन जाता है बाक्स लिफ्टर, रेलवे चोर व जहरखुरान। जी हां! बात हो रही है रेलवे की भाषा में गदाई या फिर घुमंतू कहे जाने वाले बच्चों की जो होश संभालते ही अपने मां-बाप को छोड़कर यहां के रेलवे जंक्शन पर आकर विभिन्न यात्री ट्रेनों में बकायदे अपनी नौकरी समझकर सफर करने लगते है और यात्री ट्रेनों में झाड़ू लगाकर जूते-चप्पल की चोरी, भिक्षाटन या फिर करतब दिखाकर पैसा कमा लेते है। वहीं भोजन का काम यात्रियों के जूठन से चल जाता है, जबकि इनके आशियाने का मुफीद जगह रेलवे जंक्शन है, जहां ये खुले आसमान के नीचे रहकर जीवन यापन करते हैं। दरअसल दर्जनों ऐसे बच्चे देश के विभिन्न स्थानों से यहां प्रतिदिन पहुंचने वाली लगभग दर्जनभर से अधिक ट्रेनों में किसी न किसी से यहां आ जाते है। इन्हे देखकर एकबारगी अनेकता में एकता नजर आती है। विभिन्न भाषावासी नशे की लत बुझाने के लिए एक-दूसरे की भाषा आसानी से समझने लगते है और फिर स्याही मिटाने वाले ह्वाइटनर का इंक रिमूवर व सुलेशन आदि से नये किस्म के नशे को ईजाद किए हुए है, जिसकी कश लेकर अपनी थकान मिटाते है। इसके चलते संबंधित दुकानदारों की अच्छी-खासी कमाई भी हो जाती है। यह जरूर है कि ऐसे बच्चों को सुधारने के लिए जीआरपी, आरपीएफ या फिर अन्य समाजसेवी संस्थाओं द्वारा अभियान जरूर चलाया जाता है। ..किन्तु कुछ दिन बाद मामला वही ढाक के तीन पात वाली कहावत जैसा बनकर रह जाता है।

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