राकेश केशरी
कौशाम्बी। इक्कीसवीं सदी की ओर बढ़ते भारत और बदलती दुनियां से महिलाएं बेखबर नहीं है। समय के हिसाब से आ रहे बदलाव पर पैनी नजर रखते हुए महिलाएं अपनी भूमिका दर्ज करा रही हैं। समाज की आधार शक्ति महिलाओं पर ही सभ्य समाज की परिकल्पना निहित है। नारी मां, बहन, बेटी व पति के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन करना ही उज्ज्वल भविष्य का पोषक है। राष्ट्र जीवन को जीवन्त रखने वाले महापुरूषों के सफलता के पीछे नारी का आदर्श निहित रहता है। भारत भूमि मातृरूपिणी है। विशाल मातृत्व की छाया में राष्ट्र का जीवन पल रहा है। संस्कृति में विकास का आधार कानून व आंदोलन छीना झपटी न होकर संगठित महिला शक्ति व कर्तव्य पालन को ही भारतीय आदर्श कहा गया। शिक्षा के अभाव में महिला की सामाजिक भागीदारी भी न के बराबर है। ऐसी विषम परिस्थिति से लड़ते हुए कुछ महिलाओं ने राष्ट्रीय-अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित कर उपलब्धियां हासिल करके महिला समाज का मनोबल बढ़ाया है। आज बदलते परिवेश में महिलाओं के सरोकार बदल रहे और वे समाज की मुख्य धारा से जुड़ रही है। महिलाओं में नारी शक्ति जागरण व सजग प्रहरी के साथ जहां अधिकार की बात है तो ऊहापोह की स्थिति नजर आती है। नारी को जहां अधिकार देने की बात होती है, वहीं उसके अधिकार सीमित रखने की बात भी की जाती है। शिक्षा क्षेत्र से जुड़ी विमला देवी ने अधिकारों व महिलाओं की स्थिति पर पूछने पर बताया कि भारतीय संस्कृति में सम्पूर्ण समाज परिवार है। श्रीमती अनीता शुक्ला ने कहा कि भारतीय आदर्श कर्तव्य पालन में है। कर्तव्य पालन के दायित्व में सबके अधिकार स्वत: सुरक्षित रहते हैं। श्रीमती रन्नो देवी ने कहा कि स्त्री को नारी धर्म का पालन करते हुए सजग रहने की आवश्यकता है। महिला सशक्तिकरण व विकास कार्यक्रम से जुड़ी श्रीमती रामलली शुक्ला ने बातचीत करने पर बताया कि महिलाओं के संरक्षण के लिए कानून तो बने हैं लेकिन न्याय मिलने के साथ कानून पालन में आने वाली समस्याएं अधिक हैं। श्रीमती कुसुम ने बताया कि अधिकारों के लिए महिलाओं को स्वयं जागरूक होना होगा। पारिवारिक, सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करने के साथ आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भरता के लिए कार्य करने की जरूरत है। श्रीमती राधा देवी, रेखा केशरवानी, उमा तिवारी, विमलेश कुमारी ने कहा कि महिलाओं को संगठित कर सभी के परिवार की आर्थिक मजबूती के लिए कार्य कर रही हूं, लेकिन परिवार की जिम्मेदारी सबसे पहले है,परिवार निर्माण से ही समाज बनेगा। श्रीमती ऊषा पाण्डेय ने कहा कि वर्तमान में जब आर्थिक संकट है,तो नारी को भी पुरूषों के भांति कार्य कर परिवार में सहयोग करना होगा और अपनी सहभागिता सुनिश्चित करनी होगी। राजकुमारी पाण्डेय, रेनुका त्रिपाठी ने कहा कि अधिकारों की रक्षा के लिए महिलाओं को सोचना होगा।

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