देश

national

स्कूल जाने के उम्र मे दो वक्त रोटी की सताती हैं चिंता ?

Wednesday, November 9, 2022

/ by Today Warta



राकेश केसरी

कौशाम्बी। बचपन! भविष्य की चिंता न वर्तमान की फिक्र। मगर, उम्मीदों के इस शैशवकाल को बालश्रम का ग्रहण लग गया है। शहर के कौतूहल से लेकर गांव के गलियारे तक इस अभिशाप से अछूते नहीं हैं। जिस उम्र में नौनिहालों के हाथों में किताब होनी चाहिए,तब उन हाथों में थमा दिया जाता है हथौड़ा। कानून कहता है कि चैदह साल तक के सभी बच्चे स्कूल जाएंगे। उनको शिक्षा का अधिकार है, मगर इसकी निगरानी करने वाला तंत्र नदारद है। स्कूल जाने की उम्र में कहीं बचपन भट्टो मे काम कर रहा है तो कहीं उसकी गर्दन बोझ से दबी जा रही है। कोरी स्लेट रूपी दिमाग पर उनके भविष्य का सपना नहीं, दो वक्त की रोटी की चिंता सता रही है। देश के अन्य हिस्सों की तरह कौशाम्बी जिला भी बाल श्रम से अछूता नहीं है। रेलवे स्टेशन पर चाय की आवाज लगाते इन मासूमों के अधिकारों की आवाज दब गई है, ढाबों पर जूठे बर्तनों के साथ जैसे इनका भविष्य भी घिस रहा है। देश में बाल श्रमिकों की 34 फीसद तक संख्या होने की बात कही जा रही है। जिले में इनका सरकारी आंकड़ा तो कोई नहीं है, लेकिन स्वयंसेवी संस्थाएं 30 फीसद तक बाल श्रमिक मानती हैं। जिले की बात करें तो भट्टो में बिहार व छत्तीसगढ़ के बाल श्रमिक अपना भविष्य घिस रहे हैं, जिले के औद्योगिक इकाइयों पर बाल श्रम पूर्णतया प्रतिबंधित होने के बोर्ड लगे हैं, लेकिन गरीब परिवार भट्टो मे ठेका लेकर अपने बच्चों के जीवन को भी इससे बदरंग करने में लगे हैं। बाल श्रम रोकने के लिए सरकारें चिंतित हैं, अपने ही राज्य उत्तर प्रदेश में कई योजनाऐं बाल श्रमिकों के कल्याण के लिए संचालित की गई हैं। केंद्र सरकार ने भी बाल श्रमिकों को शिक्षित करने के लिए विशेष स्कूल संचालित किए हैं, हमारे जिले में भी ऐसे दर्जनो स्कूल चल रहे हैं। बतां दें कि बीते वर्ष 2008 तक एंडस योजना भी संचालित की गई, जिसमें बाल श्रमिकों व उनके परिजनों के भरण-पोषण की भी व्यवस्था की गई। एंटी ह्यूमन ट्रैफिक पुलिस योजना बनाकर पुलिस को भी बाल श्रम रोकने का कड़ा कानून दे दिया। फिर भी बाल श्रम नहीं रुक पा रहा है। कड़ाके की ठंड हो अथवा तपती धूप, इनके चेहरे पर सिर्फ दो वक्त की चिंता ही झलकती दिखती है। बाल श्रम रोकने के हुक्मरानों के दफ्तरों में चाय पहुंचाने का काम भी यह बच्चे ही करते हैं, बात.बात पर वह चाय विक्रेता की गालियां भी खाते हैं। सवाल है कि यह अभिशाप समाज में क्यो बरकरार है, क्यों बड़े घरानों में बच्चों को ही मजदूर रखा जा रहा है, क्यो एक बाप अपने जिगर के टुकड़े को स्कूल के बजाए घरों व फैक्ट्रियों में काम करने को मजबूर हो जाता है, क्यों नहीं हम इसे रोकने के लिए आगे आते है। 

मानवाधिकार का उल्लंघन है बाल श्रम

वास्तव में बाल श्रम मानवाधिकार का भी हनन है। मानवाधिकारों के तहत शारीरिक, मानसिक, सामाजिक विकास का हक पाने का अधिकार हर बच्चे को है, लेकिन खनन, निर्माण उद्योग व कृषि क्षेत्र में भी बच्चे काम कर रहे हैं। 


Don't Miss
© all rights reserved
Managed by 'Todat Warta'