राकेश केशरी
कौशाम्बी। पुश्तैनी स्वरोजगार को बढ़ावा नहीं मिला। राजनीतिक दलों ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया। पुश्तैनी धंधे से दूर होकर लोग अन्य कार्य करने को विवश हैं। चुनाव के समय राजनीतिक दलों के लोग जब इनके पास जाते हैं तो वह उनसे सवाल करने से नहीं चूकते। नाई जाति के लोगों का पुश्तैनी धंधा बाल काटना है। पर अब इस जाति के लोग इससे विमुख हो रहे हैं। सिराथू तहसील के ग्राम शमसाबाद निवासी दिनेश कुमार नाई का कहना है कि अन्य जातियों के लोगों का इस धंधे पर कब्जा हो गया है। लोग पैसा लगाकर अच्छा सैलून खुलवाकर कमाई कर रहे हैं। गांव में दाढ़ी बाल बनवाने को अब कोई तैयार नहीं। इस धंधे से परिवार का भरण.पोषण नहीं हो पाता इसलिए मजदूरी व खेती करनी पड़ रही है। मलाक पीजड़ी के हनुमान का कहना है कि पहले किसी भी राजनीतिक दल ने हमारे पुश्तैनी धंधे की ओर ध्यान नहीं दिया। सौरई गांव के निवासी विमल धोबी का कहना है कि गांव में लोगों के कपड़े धोकर परिवार का भरण.पोषण होता था। पर गांवों में लोग खुद ही कपड़े धो लेते हैं या फिर कस्बों में खुली लांड्री पर कपड़े साफ करवाते हैं। लांड्री संचालित करने के लिए लाखों रुपये की आवश्यकता होती है। अन्य जातियों के संपन्न लोग लांड्री संचालित करवा रहे हैं। हम लोगों को परिवार पालने के लिए मजदूरी करनी पड़ती है। काष्ठ कला में निपुण ग्राम मलकिया गांव निवासी बढ़ई जाति के राजेश कुमार ने बताया कि पुश्तैनी धंधे से अब परिवार का खर्च चला पाना मुश्किल है। बाजार में लकड़ी के कारोबार पर अन्य लोगों का कब्जा होता चला जा रहा है। गांव के पुश्तैनी लोगों को उनके मुकाबले खड़ा होने के लिए मोटी धनराशि चाहिए। किसी भी सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। राघवपुर गांव के कहार जाति के हरीराम का कहना है अब कहारों को कोई नहीं बुलाता। पहले पालकी होती थी। लोगों के घर शादी.व्याह आदि आयोजनो में कहारों को पानी भरने के लिए बुलाया जाता था पर अब इस जाति के लोग बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं। इनका कहना है कि पुश्तैनी धंधा करने वालों की सरकार आर्थिक रूप से मदद करे तो बेराजगारी को कम करने में काफी मदद मिलेगी। पर इसके प्रति किसी का ध्यान नहीं। राजनीतिक दल के लोग उन जातियों को देखते हैं जिनका वोट बैंक अधिक है।

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