औरत हूं इसलिए समझती
हूं उसके जज्बातों को
चलते जाना है मुझको
मंजिल अपनी पाने को
जीवंत करना है सरल
नहीं अनेकों किरदारों को
मिटने नहीं दूंगी मैं
अपने अरमानों को
सभी पड़े हैं मेरे पीछे
मेरा अस्तित्व मिटाने को
औरत हूं इसलिए समझती
हूं उसके जज्बातों को
कहीं सुरक्षित मै नहीं
सब लगे हैं निशां मिटाने को
मेरा वजूद मुझको पता है
डरती नहीं मैं हैवानो को
कुछ बुझदिलो के कारण
क्यों मजबूर हुई मर जाने को
प्रेम में मुझको छला गया
क्यों सोची प्रीत निभाने को
औरत हूं इसलिए समझती
हूं उसके जज्बातों को
यहां सभी है छद्मवेश में
मासूम बाला को फंसाने कोई
खुद को मजबूत करो इतना
कि बुलाओ न मददगारों को
क्यों पहचान नहीं पाई
प्रेम रूप गद्दारों को
सबक सिखाना है मुझको
अब इन प्रेम के सौदागरों को
औरत हूं इसलिए समझती हूं
उसके जज्बातों को
बहुरूपियो की इस दुनिया में
पहचानी नहीं शैतानों को
जीना है अब स्वाभिमान से
हरगिज़ नहीं शीश झुकाने को
बंधन मुक्त जीवन हो मेरा
चाह समानता पाने को
सवाल यही अब उठता है
क्या जन्म हुआ यूं मर जाने को
औरत हूं इसलिए समझती हूं
उसके जज्बातों को
सीमा त्रिपाठी
शिक्षिका साहित्यकार लेखिका
लालगंज प्रतापगढ़

Today Warta