देश

national

शिक्षा की मुख्य धारा से दूर,ईंट भट्ठों झुलस रहा नौनिहालों का भविष्य

Saturday, January 28, 2023

/ by Today Warta



राकेश केशरी

कौशाम्बी। दोआबा के ईंट भट्ठों पर सैकड़ों नौनिहालों का भविष्य हर साल झुलस रहा है। शिक्षा की मुख्य धारा से तो उनका रिश्ता टूट ही रहा है, साथ में बाल श्रम को भी बढ़ावा मिल रहा है। ऐसा नहीं कि इसकी जानकारी श्रम विभाग के जिम्मेदारों को नहीं है। जिम्मेदार सबकुछ जानकर भी हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। जिले के विभिन्न इलाके में करीब 200 ईंट भट्ठे रजिस्टर्ड हैं। हालांकि संचालित लगभग 150 ही हो रहे हैं। इन भट्ठों पर जिले के मजदूर तो काम करते ही हैं। साथ ही चित्रकूट, फतेहपुर, महोबा, गंगापार, बांदा, प्रयागराज, प्रतापगढ़ आदि जनपदों से भी लेबर पथाई आदि का काम करने आते हैं। गैरजनपदों से आने वाले लेबर अपने घरों में ताला लगाकर बाल-बच्चों संग चले आते हैं। दिसंबर में भट्ठा पहुंचने के बाद वे जून या जुलाई में ही घर रवाना होते हैं। इस बीच साथ आए उनके बच्चों की पढ़ाई पूरे वर्ष के लिए चैपट हो जाती है। छोटे बच्चों से तो नहीं लेकिन, 10 से 12 वर्ष वालों से दिहाड़ी भी कराई जाती है। इसके एवज में उनको आधी मजदूरी दी जाती है। इससे बाल मजदूरी को बढ़ावा मिल रहा है। बाहरी मजदूरों का कहना है कि अपने यहां उन्हें एक हजार ईंट पाथने पर 470 से लेकर 500 रुपये तक ही मिलता है। जबकि कौशाम्बी में एक हजार ईंट की पथाई सात सौ रुपये तक है। इसीलिए यहां आकर काम करते हैं। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने के बारे में बात करने पर मजदूर पेट का सवाल दागकर किनारा काट लेते हैं। ईंट भट्ठे में काम करने वाले मजदूर राजेंद्र कुमार, प्रदीप कुमार और रेनू देवी का कहना है कि बच्चों की पढ़ाई देखेंगे तो उनका पेट भरना मुश्किल हो जाएगा। पेट की आग बुझाने के लिए नौनिहालों के जीवन से खिलवाड़ करना पड़ रहा है। सीमा देवी कहती हैं कि कौशाम्बी के ईंट भट्ठों पर पथाई का रेट ज्यादा है। अधिक कमाई के लिए यहां आना पड़ता है। गांव के भट्ठों पर काम किया जाए तो परिवार चलाना मुश्किल हो जाता है।


Don't Miss
© all rights reserved
Managed by 'Todat Warta'