देश

national

भेदभाव से उफनते दु:खों के सागर को विवेकानन्द की अद्वैत की प्रेमिल वाणी ही सुखा सकती है : प्रो. बी.एन. शर्मा

Thursday, January 12, 2023

/ by Today Warta



राजीव कुमार जैन रानू

ललितपुर। स्वामी विवेकानन्द की जयन्ती पर आयोजित एक परिचर्चा को संबोधित करते हुए नेहरू महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य प्रो.भगवत नारायण शर्मा ने कहा कि विवेकानंद जी, गुरु रामकृष्ण परमहंस से जब पहली बार मिले तो उन्होंने एक वैज्ञानिक की तरह यह प्रश्न पूछा कि क्या आपने ईश्वर को देखा है? तो उन्हें उत्तर मिला हां वैसे ही देखा जैसे  तुम्हें देख रहा हूँ। उन्होंने उनसे प्रति प्रश्न किया, दिन में जैसे हम तारों को नहीं देख सकते हैं, किंतु इसका अर्थ यह नहीं की तारे आकाश में नहीं। दूध के भीतर मक्खन रहता है, पर क्या दूध को देखकर मक्खन को जान सकते हैं ? दूध से दही बनाना पड़ता है, सूर्योदय से पूर्व ठंडी जगह में मथने से मक्खन निकलता है। ईश्वर का नाम-गान करते समय जब हम तन्मय होकर  जब हम  प्रेमोउन्मत्त हो जाते हैं तो ईश्वर की अनुभूति अपने अंदर ही करने लगते है।प्रो. शर्मा ने आगे कहा कि परमहंसजी के कमंडल से, ज्ञान की गंगा को निकाल कर स्वामी जी ने, उसे सारे संसार में जन हितार्थ प्रवाहित कर दिया। रामकृष्ण यदि अनुभूति थे तो विवेकानंद उनकी व्याख्या  बनकर आए। फलत:उन्होंने विश्वास पूर्वक का कहा कि जब हृदय पूर्ण रूप से निर्मल हो जाता है तो मन से स्वार्थ और छल की सारी दुर्गंध निकलने पर मनुष्य की परोपकारी वृत्ति पूर्ण रूप से जाग जाती है। विवेकानंदजी का आविर्भाव जबरदस्त वैज्ञानिक उफान नैतिक अव्यवस्था और बिखरती हुई मानदंडों की पराधीनता से ग्रस्त युग में हुआ था। लोगों को यह नहीं मालूम था कि वह किधर जाएं ? वे विज्ञान की भावना से आंदोलित हो रहे थे। ऐसे ही समय में विज्ञान के रंग में रंगे, विवेकानंद जी की मुलाकात परमहंस जी से हुई थी। गीता के अर्जुन की तरह उन्होंने कर्तव्य का मार्ग उन्हें दिखाया और महसूस कराया कि प्रत्येक व्यक्ति दिव्य प्रकाश रूप ब्रह्म की चिंगारी है। यदि वह हड्डियों मांस और मांसपेशियों तक सीमित नहीं है, यदि वह महसूस करता है कि उसके अस्तित्व के दूसरे आयाम भी हैं। वही उसके आध्यात्मिक आयाम हैं और उन्हीं का विकास करने की जरूरत है विवेकानंदजी ने महसूस किया कि हम बात ज्यादा  करते है और आचरण कम। जबकि आडंबर ज्यादा। स्वामीजी ने यह भी कहा कि ऐसे लोगों का एक हिस्सा उन्हें पागलखाने जैसा टापू लगता है। जिसमें बातें बघारने वाले लोग विवेक विवेकहीनता से ग्रस्त होकर जंगली व्यवहार करने  लगते हैं। ईश्वर तक पहुंचने का सीधा मार्ग मानव सेवा है। कहा जाता है हिंदू धर्म सनातन है। इसका सीधा अर्थ सत्य अहिंसा और प्रेम के बीज  सनातन रूप से पल्ल्वित होते रहे हैं और सदैव होते रहेंगे। उन्होंने कहा कि समाज की आंखें हैं संत, प्रकाश है धर्म  और धर्म का सूर्य है ईश्वर। इसीलिए वेदों में इस सनातन सिद्धांत को प्रतिपादित किया गया है एकं सदविप्रा: बहुधा वदंति। सत्य एक है किंतु उपासक एक ही सत्य की अनेक प्रकार से उपासना करता है। अनेक रंगो की गायों का दूध एकसा सफेद है, विवेकानंद जी के गुरु परमहंस जी ने महीनों तक, विभिन्न धर्मों की चर्या की और निष्कर्ष प्रस्तुत किया कि विभिन्न रास्तों से पहाड़ की चोटी पर पहुंचने वाले साधक, सत्य की चोटी पर चढ़कर समान उद्देश्य प्राप्त  करते हैं। इसलिये उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको नहीं।

Don't Miss
© all rights reserved
Managed by 'Todat Warta'