राकेश केशरी
कौशाम्बी। सात फेरों का सातो वचन का केंद्र बिंदु मड़वा आधुनिकता की भेंट चढ़ गया है। जिस मड़वा को शादी का आधारभूत मान दुल्हा-दुल्हन उसके इर्द-गिर्द सात फेरे ले शादी के पवित्र बंधन में बंधते हैं। आज वह आधुनिकता की भेंट चढ़ उल्टा दुल्हा-दुल्हन के आगे पीछे घूम रहा है। हिंदू रीति के शादी विवाहों में मड़वा का बहुत ही महत्व है। कोई भी मांगलिक कार्य इसके बगैर शुरू नहीं होता। हिंदू शादियों में तीन दिन पूर्व विधि विधान से पूर्वजों, देवी देवताओं को नमन करते हुए मड़वा (छूल की लकड़ी का बना) वैवाहिक स्थल में गाड़ दिया जाता है। फिर उसी के साथ सभी मांगलिक कार्यो की शुरूआत हो जाती है। लड़का-लड़की के कंगन बंधना है,तो मड़वा के नीचे कंगन बांधा जायेगा। उपटन लगाने की रस्म में मड़वा को पूरा हल्दी से रंग दिया जाता है। विवाह वाले दिन दुल्हा-दुल्हन अग्नि के साथ इसी के सात फेरे ले जीवन पंर्यन्त तक पति-पत्नी बन जाते हैं। शादी के पूर्व गड़ा यह मड़वा एक बार जमीन में गड़ जाने के बाद वैवाहिक रस्मों से निपट कुल परंपरा के अनुसार भादौ मास की द्वीज तिथि को विधि विधान से उखाडने की परंपरा एवं रिवाज है,लेकिन आधुनिकता के बदलते रिवाज में मड़वा की वह दुर्गति हुई है कि जिसमें दुल्हा-दुल्हन सात फेरे लेते थे। आज वह शादी के पूर्व ही दुल्हा-दुल्हन के आगे पीछे चक्कर घिन्नी की तरह स्वयं फेरे लेते हुए घूम रहा है। उनका स्थान आज बलते परिवेश में बदल गया है,जो आलीशान वैवाहिक स्थलों में दिखाई दे रहा है। जहां शादी विवाह की रस्म पूरा होते ही फिर चक्करघिन्नी की तरह घूमने लगता है। ग्रामीण आंचलों में आज भी यह रस्मोरिवाज कायम है,लेकिन शहरीकरण तथा आधुनिकता के बीच नदारत होती दिख रही है।
शासन बना रहा योजना: मंडप में ही पंडित जी कहेंगे, पंजीकरण कराओ
विवाह मंडप में पंडित जी वर-वधु को सप्तपदी, सात फेरों व अन्य कर्मकांड के साथ नवदंपति को विवाह का पंजीकरण कराने के लिए भी प्रेरित करेंगे। सूत्र बताते हैं कि शासन इसके लिए योजना तैयार कर रहा है, जिसके तहत विवाह कराने वाले पुरोहितों को चिंह्ति कर मंडप में ही जागरूक कराने का अभियान चलाया जाएगा। इसके अलावा ग्राम प्रधान, स्वयं सेवी संस्थाओं तथा प्रबुद्ध लोगों की भी इस नेक काम में मदद ली जाएगी। शासन की मंशा है कि विवाह के बाद दंपति के बीच किसी प्रकार का विवाद उत्पन्न होता है,तो किसी भी एक पक्ष के अधिकारो का हनन न हो। कई बार लग्न मंडप में सात फेरों के बाद भी नवविवाहित जोड़े अलगाव की राह पर चल पड़ते हैं। यह भी देखने को मिल रहा है कि पति-पत्नी विवाह तक को नकारने लगे हंै और समुचित साक्ष्य न उपलब्ध करा पाने से कई बार वह कामयाब भी हो जाते हैं। दूसरे पक्ष को इससे खासी परेशानी का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति रोकने के लिए विवाह के पंजीयन की व्यवस्था की गई है। चूंकि पंजीयन कानूनी तौर पर अनिवार्य नहीं है, इससे लोग पंजीयन नहीं कराते हैं। सब रजिस्ट्रार कार्यालय के आंकड़ों से पता चला कि साल भर में एक भी विवाह का पंजीयन नही हुआ है। इससे यह बात साफ हो जाती है कि लोगों में इसके प्रति जागरुकता की कमी है। इसके लिए प्रशासन ने विवाह कराने वाले कर्मकांडी के जरिए जागरुकता अभियान चलाने की सोची है। उधर, इस बावत सब रजिस्ट्रार हिंदू विवाह ने कहा कि हिंदू विवाह वैदिक परंपराओं के आधार पर अग्नि को साक्षी मानकर होते हैं। किसी प्रकार की लिखा-पढ़ी नहीं होती है। ऐसे में विवाह का पंजीयन अवश्य कराया जाना चाहिए। अनिवार्यता न होने और जागरुकता के अभाव में लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते हैं। इस दिशा में ठोस प्रयास किए जाने की जरूरत है।

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