राकेश केसरी
कौशाम्बी। प्रदेश सरकार जनता को उत्कृष्ट एवं नि:शुल्क चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के लिए करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रही हैं वहीं दूसरी तरफ चिकित्सालयों से निकलने वाले अस्पताली कचरों अपशिष्ठ, से होने वाली हानि से विभाग पूरी तरह अंजान बना हुआ है। कचरे के प्रबंधन के लिए वैज्ञानिक तौर तरीके न अपनाए गए तो इससे निकलने वाले विकिरण का दुष्प्रभाव एक स्वास्थ्य के लिए घातक साबित हो सकता है। सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की स्थापना कर जहां गरीबों को नि:शुल्क चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने की दिशा में गंभीर कदम उठाया है तो वहीं योजना मद से एंबुलेंस,भरपूर दवाएं तथा जच्चा.बच्चा के बेहतर स्वास्थ्य की दिशा में भी विभाग बेहद सतर्कता बरत रहा है। सीएचसी,पीएचसी सहित एमबीएस जैसे सरकारी अस्पतालों पर करोड़ों रुपये तो खर्च किए जा रहे है वहीं विभागीय स्तर से लापरवाही भी देखने को मिल रही हैं। बताते चलें कि अधिकांश फीसद अस्पताल घनी आबादी वाले क्षेत्रों में स्थित हैं। मरीजों के आपरेशन तथा उनके जख्म की साफ.सफाई के बाद निकले अस्पताली कचरे के प्रबंधन की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए जाते। हालात कुछ ऐसे हैं कि अस्पताली कचरे इधर उधर फेंक दिए जाते हैं। विशेषज्ञों की रिपोर्ट पर यकीन करें तो उक्त कचरे से उत्पन्न होने वाले विकिरण से अल्सर,कैंसर तथा फेफड़े संबंधी रोगों का खतरा बना रहता है। विडंबना तो यह है कि सरकारी के साथ साथ अधिकतर निजी अस्पतालों में भी कचरा प्रबंधन के विशेष उपाय नहीं किए गए हैं। यही कारण है कि अस्पताल के पीछे तथा अगल बगल मरहम पट्टी वाले अपशिष्ठ देखे जाते हैं। इस मामले में संबंधित विभाग की उदासीनता चिंता का विषय है। इस बाबत जिला अस्पताल के सीएमएस डा0 दीपक सेठ का कहना है कि शासन द्वारा निर्धारित मानकों के अनुरुप अस्पताली कचरे को नष्ट किया जाता है। इससे विकिरण जैसी किसी तरह की आशंका नहीं है।

Today Warta