राकेश केसरी
कौशाम्बी। समय की गरमाहट में परंपराएं पिघल गयीं। शादी-ब्याह और अन्य शुभ अवसरों पर गाए जाने वाले मंगल गीत अब सुनाई ही नहीं देते। आधुनिक तामझाम और गाजे-बाजे के बीच लोक जीवन की लय और अभिव्यक्ति का तो जैसे लोप ही हो गया है। बुजुर्ग रामप्रसाद बताते है कि दो दशक पहले तक हालात कुछ और थे। यानि कि शादी-ब्याह बेशक कितने भी शान-ओ-शौकत से होते हों मगर, मंगल गीतों का अपना महत्व होता था। लोक संस्कृति में सने ये गीत महिलाओं के मधुर कंठ से निकल कर कानों में रस घोलते थे, लेकिन बदलते परिवेश और आधुनिकीकरण की दौड़ में सबकुछ खो सा गया है। शमसाबाद निवासिनी ननकी देबी अतीत के झराखो से बताती है कि पहले तो हर शुभ अवसर पर जो गीत गाए जाते थे उनमे मिठास के साथ-साथ भारतीय संस्कृत की बखूबी झलक दिखाई पड़ती थी। कहा कि जैसे बन्ना हो या बन्नी दोनों की ही सगाई, लगन, भात, नौतना, हल्दी रस्म, रत-जगा, मेहंदी, दरवाजे, फेरों से लेकर विदाई तक की हर रस्म के गीत होते थे। ये गीत एक पीढी से दूसरी को हस्तांतरित होते थे, लेकिन परंपरा अब पिघल चुकी हैं। सिराथू क्षेत्र के वरिष्ठ साहित्यकार डा. हरीशकंर पाण्डेय कहते हैं कि शादी से जुड़ी हर रस्म जैसे भात नौतने को लड़का या लड़की की मां अपने भाई के यहां एक-दो नहीं बल्कि दर्जनों महिलाओं के साथ बड़ी शान के साथ पहुंचती थीं। घर से निकलते ही उनके गीत शुरू होते थे और भाई के घर तक पहुंचने तक अरे, भइया रघुवीरी, भात सवेरा लइयो, मेरे माथे की बिंदी लइयो, कंगन पे रतन जड़इयो गीत कानों में रस घोलते थे। इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता था कि कोई बहन अपने भाई के यहां भात नौतने जा रही है। लेकिन अब यह सब लुप्त हो रहा है। दो दशक पहले तक कुछ इस तरह के गीत सुनाई पड़ते थे,जैसे बन्नी के लिए हरयाला बन्ना, फेरों पे झगड़ रही रे गाया जाता था। इन गीतों में बेटी का पूरे परिवार व खानदान के रिश्तेदारों के साथ प्यार समाया होता था। इसी तरह दइया रे दइया बन्नी-बन्ने को नजर लागी, मैं डिबिया काजल की लै भागी, जैसा गीत भी बड़ा मशहूर हुआ करता था। लड़की को शादी के लिए तैयारी के लिए उठो बन्नी, सजो जल्दी, तुम्हें ससुराल जाना है। तेरे बाबा हजारी ने बड़े लाड से पाला है वहीं विदाई के समय गए जाने वाला गीत-लाडो मांगना हो सोई मांग, राम रथ हांक दिया गीत बड़े आह्लंलादित करते थे।
आयोजनों की भरमार ने समयावधि को बनाया निरर्थक
वर्तमान में वैवाहिक आयोजनों व रीति रिवाज एंव रस्में लोगो के जेब पर भारी पड़ रही है। एक तरफ जागरुक समाज आदर्श विवाह सम्मेलन आयोजित कर खचीर्ली शादियों पर पाबन्दी लगाने के लिए अभियान छेड़े हुए है तो वहीं दूसरी तरफ समाज में अपनी नाक बचाने के लिए लोग कर्ज लेकर वैवाहिक रस्मों को पूरा कराने से नहीं चूक रहे है। बिना समय के निर्धारण से भाँवर कार्यक्रम सम्पन्न हो रहे है। सात फेरे डलवाने के काम में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले पुरोहितों को भी यह नई समस्या परेशान किये है। जिस तरह की स्थितियाँ सामने आ रही है, वह ज्योतिष के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। सिलसिला यदि यही रहा तो आने वाले समय में लोग वैवाहिक आयोजनों की लगन् निकलवाना ही सम्भवता बन्द कर देंगे। क्योंकि जब समय पर वैवाहिक आयोजन हो ही नहीं पाते तो फिर ज्योतिषी संहिता का कोई औचित्य नहीं रह जाता। शास्त्री बताते है कि जो समय वैवाहिक कार्यो का निर्धारित किया जाता है, उस पर अमल होना चाहिए तभी वैवाहिक जीवन के दोषों का निवारण होता है। बड़ी प्रतीक्षा के साथ शादी समारोह किया जाता है, लेकिन विवाह में प्रयुक्त होने वाले साजो सामान के बन्दोबस्त के कारण ज्योतिषीय पक्ष को नजरअन्दाज कर दिया जाता है। पिछले कुछ वर्षो में लगातार लंग्ने पड़ रही है, इस वजह से वैवाहिक आयोजन में व्यवस्थायें करने के लिए आपाधापी मच जाती है। बैण्डबाजे के अभाव में तो कहीं घोड़े के कारण बारात नहीं चढ़ पाती। विवाह के मण्डपों को आधुनिकतम साधनों से चमकाने की लालसा के कारण नागरिक बड़ी धनराशि को खर्च करने में कोई गुरेज नहीं कर रहे है। कई तो ऐसे नागरिक है, जो अपने वैवाहिक आयोजनों के दौरान भरपूर प्रदर्शन नहीं कर पाये है। सर्वाधिक लग्न होने के कारण विवाह कार्यक्रम में प्रयुक्त होने वाले घोड़े, बैण्डबाजे, डीजे का किराया आसमान पर बना हुआ है। ग्रामीण इलाकों में आज भी राई वैवाहिक आयोजनों का मुख्य जरिया बनी हुई है। विवाह के दौरान राई न हो ऐसा हो नहीं सकता। नर्तकिया भी माँग को देखते हुए अपने नृत्य के दाम आसमान पर किये हुए है। जितनी धनराशि माँगी जा रही है उतनी देने में आयोजक कोई शिकवा गिला नहीं कर रहे है।

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