राकेश केशरी
कौशाम्बी। सरकारों की उपेक्षा सहित विभिन्न कारणों से किसानों की हालत ठीक नहीं है। दिन ब दिन क्षीण होती जमीन की उर्वरा शक्ति तथा संसाधनों के अभाव में कृषि कार्य से किसानों का मन खिन्न होता जा रहा है तथा लोग दूसरे व्यवसाय अथवा नौकरी की तलाश कर रहे हैं। हालांकि कुछ किसान आज भी कृषि कार्य को सर्वोत्तम मानते हैं तथा परिश्रम के बल पर न सिर्फ आजीविका के संसाधन जुटा रहे हैं बल्कि इसे व्यवसाय का रुप भी देने में पीछे नहीं हैं। ऐसे ही किसानों में शामिल हैं सिराथू विकास खण्ड़ के हटवा गांव निवासी शिवेन्द्र त्रिपाठी। इनका विश्वास न सिर्फ खेती बारी पर आज भी बना हुआ है बल्कि वे परंपरागत गेहूं, धान, सरसों, अरहर के साथ आलू की फसलों का बेहतर ढंग उत्पादन कर आजीविका के संसाधन बना रहे हैं। इसके लिए भले की उन्हें तमाम तरह की दुश्वारियों का सामना करना पड़े लेकिन वे कृषि कार्य को ही अपना व्यवसाय समझते हैं। लंबे समय से कृषि कार्य से जुड़े श्री त्रिपाठी परंपरागत गेहूं, धान व अरहर की खेती में अधिक विश्वास रखते हैं। हालांकि आलू व अन्य सब्जियों की खेती भी करते हैं। दस बीघा से अधिक जमीनों पर खेती करने वाले श्री त्रिपाठी राजकीय नलकूपों अथवा सरकारी सहयोग पर भरोसा नहीं करते। सिंचाई हेतु खुद की व्यवस्था है तथा अन्य संसाधन भी रखते हैं। जैविक खादों के माध्यम से भूमि को खेती लायक बनाने के साथ साथ अथक परिश्रम भी करते हैं। परिणाम स्वरुप कम लागत में अधिक मुनाफा कमाने का अवसर हाथ से जाने नहीं देते। उनका कहना है कि जिनके पास पर्याप्त भूमि है अथवा कृषि कार्य के प्रति लगन उनके लिए इससे बेहतर दूसरा व्यवसाय हो ही नहीं सकता। बताया कि लोग दूसरे व्यवसाय को आजीविका का साधन बनाने में जुटे हैं जबकि कृषि कार्य के माध्यम से बेहतर मुनाफा कमाया जा सकता है।

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