राकेश केशरी
कौशाम्बी। पर्यावरण की सुरक्षा के लिए अभियान चलाकर खेतों में पुआल जलने से रोका गया। 24 घंटे निगरानी के लिए टीमें गांव-गांव भटकती रहीं। नियमों की अनदेखी करने वाले दर्जनों किसानों पर मुकदमा भी दर्ज हुआ। इनमें से कई किसानों को गिरफ्तार किया गया था। यह अभियान काफी हद तक सफल रहा। गेहूं बोआई से पहले किसानों ने पुआल को खेत में किसी कोने एकत्र कर दिया अथवा घर उठा लाए। ठंड प्रचंड होने पर गांवों में अब यही पुआल अलाव में जलाए जा रहे हैं। इस प्रकार पर्यावरण की सुरक्षा के लिए की गई मेहनत पर पानी फिरता नजर आ रहा है। गांवों में अलाव का कोई प्रबंध न होने से किसानों को ठंड से बचाव के लिए कोई अन्य विकल्प भी नहीं सूझ रहा है। गौरतलब हो कि खेतों में पुआल जलाने से रोकने के लिए इस बार प्रशासन के तेवर शुरूआत से सख्त रहे। बिना रीपर अथवा एसएमएस के कंबाइन मशीनों को नहीं चलने दिया गया। कृषि विभाग के फील्ड कर्मचारियों के साथ राजस्व विभाग की टीम को भी निगरानी के लिए लगाया गया था। न्यायपंचात स्तर पर टीमों का गठन करने के साथ इसकी सूचना के लिए कंट्रोल रूम का गठन किया गया था। सैटेलाइट से खेतों की निगरानी हो रही थी। लोगों को जागरूक करने के साथ तेजी से दंडात्मक कार्रवाई भी शुरू हुई। मुकदमे दर्ज होने शुरू हुए तो किसानों ने अपने कदम पीछे खींच लिए। खेतों से एकत्र पुआल को एक स्थान पर लगा दिया गया। ठंड के मौसम में यह पुआल लोगों के अलाव पर जलाने के काम आ रहा है।
पर्यावरण में बढ़ेगा कार्बनडाइआक्साइड
कृषि वैज्ञानिक डॉ0 मनोज सिंह बताते हैं कि खेतों में पुआल जलाने से पर्यावरण को नुकसान होने के साथ मिट्टी की उर्वराशक्ति भी नष्ट होती है। खेतों से बाहर अलाव पर पुआल जलता है तो इससे भारी मात्रा में कार्बनडाइआक्साइड का उत्सर्जन होता है। यह पर्यावरण के लिए हानिकारक है। इसके अलावा पुआल जलाने से निकले वाला डस्ट पार्ट भी हानिकारक होता है।

Today Warta