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जैन समुदाय ने मनाया सूर्योत्सव, यमुना में स्नांन कर भगवान पदमप्रभु व महावीर स्वामी की पूजा अर्चना

Saturday, January 14, 2023

/ by Today Warta



राकेश केशरी

कौशाम्बी। सूर्य उपासना का पर्व मकर संक्रांति जितने उल्लास-उमंग के साथ हिन्दू मनाते हैं। उतनी ही आस्था-संकल्प से जैन संप्रदाय के दिगम्बर अनुयायी भी सूर्य का उत्सव मानते चले आ रहे हैं। मंझनपुर तहसील स्थित पभोषा पहाड़ पर सर्वधर्म संभव की छटा देखती है। जहां लोग यमुना नदी में आस्था की डुबकी लगाकर जैन तीर्थंकर भगवान पदमप्रभु व महावीर स्वामी की पूजा अर्चना करते हैं। इस स्थान पर सदियों से विशाल मेला भी लगता चला का रहा है। जिसे देखने देश-प्रदेश के कोने कोने से लोग आते हैं। जैन अनुयायी इस स्थान की महिमा का गुणगान करने नहीं थकते हैं। मंझनपुर तहसील क्षेत्र के यमुना नदी के पावन तट पर पभोषा गांव बसा है। जैन सम्प्रदाय में यह स्थान प्रभाषगिरी के नाम से उल्लेखित है। जैन ग्रंथों में छठे जैन तीर्थंकर भगवान पदम प्रभु का जन्म एवं तप स्थल प्रभासगिरि पहाड़ को बताया गया है। जहां प्रकृति-तप-आस्था का संगम देखने को मिलता है। जैन अनुयायी मुनिराज जैन ने बताया कि पदम प्रभु ने तपस्या करने के बाद अपने अनुयाइयों को इसी स्थान पर दीक्षा दी। पदम प्रभु के गो-लोक वासी होने के बाद उनके अनुयइयों ने पभोसा में एक बड़ा सा मन्दिर बनवा दिया। मकर संक्रांति के दिन लगाने वाले सालाना मेले में देश भर से जैन समुदाय के लोगो के अलावा दूसरे धर्म के लोगो की भीड़ जुटती है। जैन तीर्थ को जिनालय कहते हैं। साल भर यहां आने वाले दूर दराज के लोग प्रभु के दर्शन करके उनके बताये रास्ते पर चलने का संकल्प दोहराते है। मकर संक्रांति के दिन लगाने वाले मेले में देश ही नहीं विदेशों से जैन अनुयाई यहाँ आते है। प्रभास गिरी पर्वत पर अलग-अलग स्थान पर दो मन्दिर बने हैं। जहां पदम प्रभु के वचनों के सार दशार्या गया है। पदम प्रभु बचपन में ही अनेक विधाओं से सुशोभित हो गए थे। इसके बाद वह संसार, शरीर और भोगो से बिरक्त हो कर जिन दीक्षा ग्रहण कर तप किया। यही पर जैन धर्म के 5 कल्याणक में 2 कल्याणक (गर्भ एवं जन्म) हुए है।


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