राकेश केशरी
अवसाद से ग्रसित व्यवहार को परिवर्तित कर स्वाभाव होता हैं चिड़चिड़ा
कौशाम्बी। भागमभाग भरी जिंदगी, घर के जिम्मेदारियों का टेंशन आफिस में जिम्मेदारियों का बोझ कामकाजी लोगों में तनाव को बढ़ा रहा है। काम के बोझ से लदे लोग अवसाद से ग्रसित हो रहे हैं। खास तौर पर निजी सेक्टर में काम करने वाले लोग जिनके लिए न कोई ड्यूटी का समय ना ही कोई ओवर टाईम। बस संस्था को सिर्फ काम चाहिए। यह जिम्मेदारी कर्मचारियों को कहीं ना कहीं परिवार नात.रिश्तेदारों से दूर कर ही रही है। साथ ही वे नशे के भी शिकार हो रहे हैं। यहां काम करने वालों का संगठन भी नहीं होता कि वे अपनी समस्या को प्रभावी ढंग से संस्था के सामने रख सके। यह सारी समस्यायें इन्हें कुंठा का भी शिकार बना रही है। समाज शास्त्री व मनोवैज्ञानिक इसे व्यवस्था का दोष और एक बड़ी समस्या मानते हैं। जरा सोचिए आप सरकारी कर्मचारियों के लिए ड्यूटी का एक नियत समय होता है। साथ ही यहां जिम्मेदारिया भी बटी होती हैं। लेकिन निजी सेक्टर में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। किसी संस्था या प्रतिष्ठान द्वारा कर्मचारी से आठ से घंटे से अधिक काम लेना अपराध है। इसके बाद भी यह कार्य धड़ल्ले से हो रहा है। अधिकारी कहीं ना कहीं इस गंभीर मामले पर चुप्पी साधे हुये हैं, जबकि समाजशास्त्री इसे बड़ी समस्या के रूप में देख रहे हैं। समाजशास्त्र प्रवक्ता डा0 नीरज कुमार का कहना है कि यह एक बड़ी समस्या है। व्यक्ति में कार्य करने की एक निश्चित क्षमता होती है। क्षमता से अधिक काम करने की स्थिति में व्यक्ति शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वास्थ्य नहीं रह सकता। काम का बोझ व्यक्ति को अवसाद से ग्रसित कर उसके व्यवहार को परिवर्तित कर देता है। स्वाभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। जिसका असर उसके सामाजिक जीवन व परिवार पर भी पड़ता है। तमाम संस्थाओं में कर्मचारियों को कार्य के हिसाब से वेतन भी नहीं मिलता। सही मायने में संस्था सरकारी हो या निजी व्यवस्थाएं सामान्य होनी चाहिए और कार्य का एक निश्चित समय होना चाहिए। मनोवैज्ञानिक डा0 विजय कुमार कहते हैं कि व्यक्ति कितना भी व्यस्त हो लेकिन परिवार की उससे कुछ अपेक्षायें होती है। आज के परिवेश में बेरोजगार काम न मिलने व प्राइवेट सेक्टर में नौकरी करने वाले काम के बोझ से इतने दबे हुए हैं कि वे पारिवारिक जीवन का निर्वहन नहीं कर पाते। परिवार की अपेक्षा पूरी न होने पर घर का माहौल तनाव पूर्ण होता है। जबकि आफिस में काम के बोझ से लदा व्यक्ति तनाव में ही घर लौटता है ये दोनों तनाव मिलकर उसे फ्रस्टेशन अथवा कुंठा का शिकार बना देते हैं। इससे उसका जीवन नरकीय हो जाता है। कभी.कभी लोग तनाव से बचने के लिए नशे का सहारा लेते हैं जो उन्हें और भी विनाश की तरफ ले जाता है। जरूरी है कि परिवार और काम से सामंजस्य बिठायें।

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