इन्द्रपाल सिंह'प्रिइन्द्र
ललितपुर। अखिल भारतीय साहित्य परिषद उत्तर प्रदेश एवं नेहरू महाविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में नव संवत्सर एवं नवरात्र के पावन पर्व पर श्रीरामचरितमानस एवं भारतीय संस्कृति विषय पर तुलसी सभागार में संगोष्ठी का आयोजन एवं रामचरितमानस समर्पण महोत्सव संपन्न हुआ, जिसमें 500 छात्र छात्राओं को रामचरितमानस की प्रतियां भेंट की गई। कार्यक्रम का शुभारंभ नेमवि के प्राचार्य प्रो.राकेश नारायण द्विवेदी एवं अखिल भारतीय साहित्य परिषद के जिलाध्यक्ष प्रो.डा.ओम प्रकाश शास्त्री ने दीप प्रज्वलन एवं मां सरस्वती का पूजन कर किया। इस अवसर पर उपस्थित विद्वानों ने कहा कि रामचरितमानस विश्व में करोड़ों लोगों को सही मार्ग दिखाने का कार्य कर रही है। रामचरितमानस भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है। उसमें वर्णित भगवान राम का चरित्र संपूर्ण भारत वासियों के लिए अनुकरणीय है। जितनी बार भी राम के चरित्र को गाया सुनाएं सुनाया जाएगा, उतनी ही बार वह आनंदित करने लगता है। विश्व में जितनी प्रसिद्धि रामचरितमानस को मिली है उतनी किसी ग्रंथ को प्राप्त नहीं हुई। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए प्राचार्य प्रो.राकेश द्विवेदी ने रामचरितमानस की साहित्यिक व्याख्या करते हुए कहा कि हिंदी साहित्य में रामचरितमानस सूर्य के समान प्रकाशमान ग्रंथ है। आज भी भारत देश के जन-जन का आदर्श ग्रंथ है। रामचरितमानस हमारी संस्कृति में सबसे लोकप्रिय एवं पूज्य ग्रंथ माना गया है। उन्होंने कहा कि परतंत्र भारत में भारतीय समाज को एक सूत्र में जोडऩे का कार्य रामचरितमानस ने किया। संगोष्ठी को संबोधित करते हुए संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो.डा.ओमप्रकाश शास्त्री ने कहा संत तुलसीदास ने बुंदेलखंड में जन्म लेकर इस भूमि को विश्व में प्रसिद्ध किया है। संत तुलसी ने राम के चरित्र को जन भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त कर राष्ट्र के मूल्य सुरक्षित रखने की दिशा में कारगर प्रयास किया है। उनका चिंतन एक एक चौपाई में मुखरित होता है। उन्होंने भाषा में प्रचलित सीधे-साधे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए लोगों कोचार वेद अठारह पुराण छ: शास्त्र उपनिषदों का ज्ञान कराया। यही वजह है कि रामचरितमानस का गान जितनी बार भी किया जाए उतने बार आनंद प्राप्त होता है। उन्होंने ऐसे समय रामचरितमानस की रचना की जब भारत में संस्कृत एवं संस्कृति का प्रभाव घट रहा था। जनसाधारण भोग विलास की ओर उन्मुख होता चला जा रहा था। ऐसे समय उन्होंने राष्ट्र धर्म एवं भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए रामचरितमानस का सृजन कर जन आंदोलन का सूत्रपात किया। अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के महामंत्री डा.सुधाकर उपाध्याय ने कहा कि पूरी दुनिया में भारत वासियों के मध्य रामचरितमानस जितना लोकप्रिय एवं श्रद्धा का ग्रंथ है। उतना दूसरा कोई ग्रंथ नहीं है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति रामचरितमानस की एक-एक चौपाई में समाहित है। संस्कृत प्रवक्ता डा.प्रीति सिरोठिया ने कहा कि भारत देश के निवासी 500 वर्षों से रामचरितमानस को अपने जीवन का आधार बनाकर आगे बढ़ते आ रहे हैं। रामचरितमानस भारत वासियों के लिए आचार संहिता है। संगोष्ठी के समापन पर छात्र-छात्राओं एवं प्राध्यापकों ने सामूहिक एक साथ सुन्दरकाण्ड पाठ का किया। इस अवसर पर प्रो.आशा साहू, प्रो.अनिल सूर्यवंशी, हिमांशुधर द्विवेदी, श्रीमती अनीता, डा.संजीव शर्मा, डा.सुधाकर उपाध्याय, डा.ओपी चौधरी, डा.राजीव रंजन, डा.प्रीति सीरोटिया, डा.शैलेंद्र सिंह चौहान, डा.बलराम द्विवेदी, डा.वर्षा साहू, डा.ऊषा तिवारी, डा.राजेश तिवारी, डा.रोहित वर्मा, डा.विनीत अग्निहोत्री, डा.विनोद वर्मा, डा.रजनी चौबे, डा.सुभाष जैन, डा.रोहित मिश्रा, विवेक पाराशर, रमेश पाल, हरीप्रसाद, संजय शर्मा, जयन्त चौबे, गजेंद्र सिंह, हरदयाल, भरत सिंह, सुरेश पाल आदि प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। संचालन डा.सुधाकर उपाध्याय ने किया। अंत में संस्कृत प्रवक्ता डा.प्रीति सिरोठिया ने सभी का आभार व्यक्त किया।

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