इन्द्रपाल सिंह'प्रिइन्द्र
ललितपुर। अहिंसावतार महावीर स्वामी ने कहा है कि मनुष्य अभिलाषा के पंखों पर धरती से आकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर उड़ता है। जब हम दूसरों को अपने व्यवहार से कष्ट नहीं पहुचायेंगे तभी हम अहिंसक माने जायेंगे। जरूरतमंदों की हम दिल खोल कर सहायता करेंगे। वस्तुत: त्याग इसी की प्राप्ति का मार्ग है। क्रोधी व्यक्ति सदैव दूसरों को सुधारने के लिए उत्सुक होता है, किन्तु विवेकशील व्यक्ति अपने को सुधारता है। जैन दर्शन की त्रिरत्न की श्रद्धा सही ज्ञान और सही आचरण है। भगवान महावीर द्वारा प्रतिपादित पंचशील सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह के सनातन सिद्धान्तों की मिठास घोलकर सार्वभौम चिन्तन के क्षेत्र में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। भगवान महावीर ने अपना सारा जीवन आत्मसंयम और तपस्या में बिताया। उनके समान निष्कंप साधक कोई दूसरा नही है। वे समस्त मानव जाति के आदर्श प्रवक्ता हैं। सनातन सिद्धांत अहिंसा या प्रेम अथवा मैत्री या अद्रोह किंवासमभाव कल आज और आगे भी परम धर्म के रूप में सदा प्रतिष्ठित रहेंगे। पूर्ण ज्ञान अथवा केवल ज्ञान प्राप्त करने के बाद भगवान महावीर ने धर्मोपदेश आरम्भ किया। उनके शान्त, ज्ञानोद्दीप्त मुखमण्डल के दर्शन मात्र से उनकी प्रवचन सभा समवशरण कहलाने लगी थी। पशु पक्षी तक उनकी काया की भाषा को जानकर निडर होकर उन्हें अपना सच्चा शुभचिन्तक जानकर उनके वात्सल्य भाव से गदगद हो उठते थे। भाषा की असमर्थता तथा शब्दों की सीमित समझ के कारण हमारी खंडित, अपूर्ण, सीमित, आंशिक जीवनदृष्टि को यदि अनेकान्ती एवं बहुआयामी समग्र दृष्टि मिल जाए तो स्रृष्टि बदलते जरा भी देर नही लगेगी, पर भगवान महावीर के अनेकान्तवादी विचार दर्शन के पानी के होते हुए भी हमारी दशा पानी विच मीन प्यासी, मोहि सुन सुन आवै हांसी की तरह है। अभी भी देर नही हुई जब जागो तभी सवेरा। वर्धमान की अविनाशी निरक्षरी वाणी की तरंगें हवा में तैर रही हैं, हम जब चाहे हृदय के तार उनसे जोड़ सकते हैं।

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