राकेश केशरी
कौशाम्बी। किसी शादी.ब्याह या अन्य सार्वजनिक कार्यक्रम में मिलने पर एक दूसरे के गले में बाहें डालने वाले नेताजी के मन में वोट की खातिर खोट आ चुका है। प्रचार.प्रसार के दौरान यदि दो प्रत्याशी आमने.सामने आ गए तो दुश्मनों की तरह नजरें चुरा कर किनारा करना उनकी फितरत हो गई है। गनीमत है कि अभी दुश्मनी खूनी नहीं हुई है। अमूमन देखने को मिलता है कि किसी शादी.ब्याह या सार्वजनिक कार्यक्रम में यदि अलग.अलग राजनीतिक दलों के नेता मिल जाएं तो एक टेबल पर खाना,एक दूसरे से गले में बाहें डालना व खुलकर मिलने से परहेज नहीं करते,लेकिन चुनावी सीजन में नेताओं की फितरत बदल गई है। राजनीति की इस फिल्म में यह नेता जानी दुश्मन का किरदार निभा रहे हैं। इस समय प्रत्येक पार्टी के प्रत्याशी दूसरे प्रत्याशियों को रत्तीभर पसंद नहीं कर रहे हैं। दरअसल अब सभी प्रत्याशी वोट बटोरने के लिए जनता के बीच में हैं। ऐसे में किसी न किसी वार्ड या गली.मोहल्ले में उनका एक दूसरे से टकराव हो ही जाता है। हालांकि वह एक दूसरे से बचने की भरसक कोशिश करते हैं,लेकिन चाह कर भी वह बच नहीं पाते। ऐसे माहौल में लश्कर के साथ चल रहे प्रत्याशी दूसरे प्रत्याशी से नजरें चुरा कर बचने में ही भलाई समझते हैं। हाव.भाव देखकर लगता है कि दोनों के बीच पुरानी दुश्मनी है। जबकि लोग बखूबी जानते हैं कि नेताओं की यह नाराजी चंद दिनों की है। चुनाव खत्म होने के बाद मौका मिलते ही यह फिर से एक दूसरे से बतियाते नजर आएंगे।

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